एक बोेहीमियन लेखिका

हिंदी से इतर भाषाओं में जिन दो लेखिकाओं ने लिखा और हिंदी में लोकप्रिय हुईं, वे अमृता प्रीतम और कुर्रतुल-एन-हैदर थीं। अपने दोस्तों-अजीजों में ऐनी आपा के नाम से मशहूर हैदर ने उर्दू में कहानियां लिखीं और उनका अनुवाद हिंदी पाठकों में उन्हें लोकप्रिय बना गया। उनकी कहानियां अभिजात्य वर्ग की कहानियां थीं, जो किसी भी पाठक के लिए तिलिस्म से कम न थीं। ये एक अलग सी दुनिया की कहानियां हैं, जो पाठक के जीवन से भले ही जुड़कर न चलती हों, पर अपनी जादुई दुनिया में वे पाठकों को खींचती जरूर हैं। कुछ वैसे ही जैसे किसी घने जंगल में एक बड़ा सा महल हो और उसके हर झरोखे-खिड़की या दरीचे में एक कहानी छिपी हुई हो। कुर्रतुल-एन-हैदर एक खास शैली की लेखिका थीं। ऐसी लेखन शैली, जिसमें रिश्तों की कड़वाहटें भी शहद की मिठास के साथ पेश होती थीं। आधुनिकता और अनोखेपन का संगम थीं हैदर और बोल्डनेस में कहीं-कहीं तो मंटो की साहसिक रेखा को भी छू जाती थीं। जब 1947 में उनका पहला कहानी संग्रह ‘शीशे का घर’ प्रकाशित हुआ, तभी कुछ बुद्धिजीवियों ने समझ लिया था कि ये समय से काफी आगे की कहानियां हैं। उर्दू साहित्य में इन्हें नया प्रयोग तो माना गया, पर पहचान नहीं मिली। हां, इसके बाद की कहानियां खूब चर्चित भी हुईं और लोकप्रिय भी। यह आश्चर्यजनक ही था कि समाज में रहकर भी वह किसी भी भाषा, धर्म अथवा क्षेत्रीय विवाद से दूर रहकर खामोशी से अपने साहित्य सृजन में लगी रहीं। उपन्यास, लघु उपन्यास, रिपोर्ताज इन सभी विधाओं में उन्होंने इतना लिखा कि जीते जी मिथक हो गईं। ‘आग का दरिया’, ‘कारे जहां दराज है’, ‘आखिरी शब के हमसफर’, ‘मेरे सनमखाने’, ‘चाय के बाग’, ‘दिलरुबा’,  ‘चांदनी बेगम’ और ‘अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो’ उनकी प्रसिद्ध रचनाएं हैं। लोगों ने उनकी रचनाओं को पढ़ा और उनके कायल हो गए। मंटो, कृष्ण चंदर और राजेंद्र सिंह बेदी के बाद उभरने वाले उर्दू कथाकारों में हैदर को महत्त्वपूर्ण स्थान मिला। उस दौर में कहानियों के मुख्य पात्र मजदूर, किसान, क्लर्क, तवायफें या बेरोजगार होते थे। ऐसे दौर में ऐनी आपा की ‘सितारों से आगे’ आई, जो एकदम अलग ही विषय लेकर लिखी गई थी। इन रचनाओं में समाज का मेहनतकश वर्ग नहीं था, बल्कि कोठियों और क्लबों में जो कुछ होता था, वही लिखा गया था। हां, भाषा और तकनीक की दृष्टि से ये कहानियां एकदम अलग थीं। आलोचकों ने इस संग्रह की जमकर आलोचना की, पर पाठकों को इन रचनाओं में कुछ और ही मिला। जीवन के अर्थहीन होने का एहसास और शायराना उदासी पाठकों को मोहित कर गई। हैदर ने कहानी कला को नए आयाम दिए और भारतीय कहानी लेखन में शानदार करिश्मा बन गईं। 21 अगस्त 2007 को उनकी मौत के साथ ही उनके बोहीमियन लेखन का भी अंत हो गया।

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