कश्मीर से पहल

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कश्मीर पर बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में जिन मुद्दों को उठाया है, उनसे कश्मीर को लेकर उनकी वास्तविक चिंता उजागर होती है। प्रधानमंत्री ने कश्मीर समस्या का राजनीतिक समाधान खोजने की जरूरत पर जोर देने के अलावा कश्मीर में हिंसा के चलते युवाओं को अलगाववादियों के चक्रव्यूह से निकालने का संकल्प जाहिर किया है। ऐसा करते हुए उन्हांेने सीमा पार से आतंकवादी तत्त्वों द्वारा राज्य के युवा वर्ग को देश की मुख्य धारा से
विलग करने की साजिश को घाटी के युवकों को रोजगार देने का वादा कर दिशा प्रदान करने की पहल की है। एक ऐसे समय में, जबकि कश्मीर स्थानीय विरोध व हिंसा के कारण के कठिनतम परिस्थितियों से गुजरता रहा है, राज्य मंे युवकों को रोजगार देने की पेशकश सहायक सिद्ध हो सकती है। यह
इस बात पर भी निर्भर करेगा कि ऐसी योजनाएं मात्र कागजी सिद्ध न हों और उनके लिए भ्रष्टाचारियों का निवाला न बन पाएं। कश्मीर में युवा वर्ग का अलगाववादियों के हाथों
मुख्यधारा से हटना तथा उनके इशारों पर पत्थर लेकर सड़कों पर उतर आना प्रधानमंत्री ही नहीं देश के हर उस व्यक्ति
की भावनाओं को आहत करता होगा, जो देश भक्त हैं। उस लिहाज से प्रधानमंत्री का युवकों को अपने स्कूलों व
कालेजों में लौटने का आह्वान अर्थपूर्ण तो है ही, सही समाधान का रास्ता भी तैयार कर सकता है। वैसे भी कश्मीर के लोगों
को शांति का एक मौका देना चाहिए, विशेषकर जबकि प्रधानमंत्री के शब्दों मंे शांति व समाधान ही कश्मीर मसले का सही हल हो सकते हैं। इसके साथ ही राज्य के त्वरित आर्थिक विकास एवं ढांचागत विकास पर बल देना होगा। इस उद्देश्य के लिए केंद्र को निजी व सार्वजनिक क्षेत्र का सहयोग हासिल कर संबंधित योजनाएं तुरंत अमल में लानी होंगी। यह भी जांचना होगा कि आज तक कश्मीर के विकास को केंद्र द्वारा बहाया जाने वाला धन कौन डकारता रहा है। हालांकि सईद अली शाह गिलानी जैसे अलगाववादी नेता आज भी घाटी में असंतोष को हवा दे रहे हैं। सभी दलों व संगठनों को विश्वास में लेकर राज्य की मौजूदा समस्या का हल खोजना कठिन नहीं होना चाहिए।  प्रधानमंत्री ने राज्य के लिए संवैधानिक ढांचे के भीतर स्वायत्तता का सुझाव भी रखा है। इस काम में पहले ही काफी विलंब हो चुका है और इस तरह की अस्थिरता के चलते राष्ट्र विरोधी तत्त्वों को हिंसा फैलाने का मौका भी मिलता है। कश्मीर में सशस्त्र सेना को मिले विशेषाधिकार कानून को लेकर उपजे स्थानीय विरोध को देखते हुए तुरंत कोई फेरबदल करने के बजाय चरणबद्ध तरीके से राज्य पुलिस को कानून व व्यवस्था का जिम्मा सौंपना उचित होगा। अभी वह इस हालत में नहीं है, जबकि सेना व सुरक्षा बल उसके कवच बने हैं। कश्मीर में यदि मौजूदा सरकार का कामकाज संतोषजनक नहीं है, तो किसी किंतु-परंतु में न पड़ कर राज्य के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था करना गलत न होगा। यहां मुख्य प्रश्न राष्ट्रीय हितों की रक्षा का होना चाहिए न कि राजनीतिक संतुष्टिकरण का।

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