कितना धंसा हिमाचल

बाहर मानसूनी तेवर अगर विकराल थे, तो विधानसभा सत्र भी कम नुकीला नहीं था। बतौर विपक्ष कांग्रेस ने सरकारी प्रणाली के धंसते सबूत खोज निकाले और साथ ही कुछ मंत्रियों की कारगुजारी पर भी प्रश्न चस्पां किए। बहस के ढोल कुछ बदले और यह संकेत भी दे गए कि कांग्रेस अब विपक्ष की भूमिका में सशक्त हो रही है। बरसाती उफान के चश्मदीद गवाह बने कई, लेकिन सबूतों की फेहरिस्त में शिमला का रिज भी धंस गया। प्रदेश के हर गांव, कस्बे और शहर का दिवालिया चेहरा इस बार मानसून से खौफजदा है। बंजर घाटियों को भयंकर बरसात की घंटी स्पष्ट सुनाई दी, तो बादलों के फटने का सिलसिला रौंदता रहा परिवेश को। कहीं तो हम धंस रहे हैं। कहीं तो हमारा विकास कमजोर है। कहीं तो हमारी नीतियां कमजोर हैं, या आचरण के दस्तावेज शिकायत कर रहे हैं। पर्वतीय विपदाओं की शुमारी में हम बार-बार कांपते हैं, लेकिन इस बार बर्बादी का आलम हर घर की चारदीवारी लांघ रहा है। क्योंकि समाज का रिसाव अपनी सीमाएं तोड़ चुका है, इसलिए विध्वंस के कबूतरखाने में जीवन की आशाएं भी सिमट रही हैं। अतिक्रमण की मानसिकता से ग्रस्त समाज के सामने मौसम के बिगड़ते मिजाज की बानगी और क्या होगी कि अब न जल सार्वजनिक है और न वायु पर भरोसा रहा। शिमला का रिज हमारी आंखों के सामने धंस रहा है और वहां बेनूरी पर चिंतन के बजाय, हम निजी स्वार्थों के पैबंद में शहर को देख रहे हैं। कितना बदल दिया हमने शिमला। यह सब इसलिए क्योंकि सरकारी व निजी संपत्ति में अंतर होता है। आज शिमला में निजी संपत्तियां तो सीना तानकर खड़ी हैं, लेकिन शहर की कमर झुक रही है। पारंपरिक जल निकास प्रणाली को रोक कर हम शिमला के धंसते मंजर पर खामोश हैं। खामोश प्रदेश के हर गली और मोहल्ला हैं और भ्रष्टाचार के नासूर को देखकर भी हमारी सेहत पर कोई असर नहीं। हमें शिकायत है और शिकायतों के अंबार के बीच सरकारी नीतियां बदलाव कर रही हैं। इन्हीं शिकायतों का पुलिंदा मानसून सत्र के दौरान बार-बार खुला। कई गंभीर प्रश्नों के बीच शिलाई का धंसता हुआ अंबेडकर भवन भी देखा गया और जहां सूचनाएं आपस में उलझती रहीं। विधायक हर्षवर्धन के प्रश्न से बिंधे सरकारी पक्ष की जवाबदेही का आलम पूरे मानसून सत्र का नाजुक मोड़ है। यह सत्ता बनाम विपक्ष नहीं बल्कि हिमाचल बनाम हिमाचल है। एक ओर जनापेक्षाओं और जनास्था से लिप्त हिमाचल अंबेडकर भवन की बुनियाद में अपना विकास देख रहा है और दूसरे किसी इमारत की दुर्दशा के भीतर मुंह छिपाकर बैठा हिमाचल। यह हिमाचल हर रोज धंसता है। यह व्यवस्था की खामियों, समाज की बेरुखी और हर पल पैदा हो रहे माफियाओं की सूरत में देखा जा सकता है। यह वह हिमाचल है जिसे अपने ही आचरण से घबराहट है। यह मूर्छित हवाओं के अज्ञात रुख की कैद में है, जहां न सजदा है और न ही सलीका। शिमला रिज की खरोंच को भर भी दें, लेकिन जहां चरित्र निर्माण की हर सामग्री बिखर रही हो, वहां केवल बहस करके भी हम क्या कर पाएंगे। प्रदेश की हजारों प्रतिमाओं, प्रतिभाओं के बीच, दफन होते मंसूबे आखिर किस जागृति से जाग पाएंगे। इस बार सार्वजनिक निर्माण विभाग ने अवश्य ही मानसून से मुकाबला किया और ढहते पहाड़ों के बीच परिवहन की जीवन रेखाओं का अस्तित्व मिटने न दिया। अगर सार्वजनिक निर्माण विभाग आपातकाल में ऐसा बदलाव कर सकता है, तो सामान्य परिस्थितियों में हमारी आवश्यक सेवाएं क्यों गड़बड़ा रही हैं-इस प्रश्न का उत्तर हम सभी को पता है, लेकिन फिर भी विभ्रम की कोख में हमारे सपने पल रहे हैं।

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