किसानों में असंतोष क्यों?

उत्तर प्रदेश में भूमि अधिग्रहण को लेकर किसानों में भड़का गुस्सा अभी थमा नहीं है। राज्य सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण का मुआवजा बढ़ाने की पेशकश के बावजूद आगरा व अलीगढ़ में किसानों  के आंदोलन का जारी रहना यह सिद्ध करता है कि समस्या अभी हल नहीं हो पाई है। इस बार बहुप्रचारित एक्सपे्रस हाई-वे के निर्माण हेतु किसानों की जमीन अधिगृहीत करने तथा मायावती सरकार की पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी)॒ की कई योजनाओं को अमल में लाने की पेशकश विवाद का मुद्दा बनी है। इन्हें लेकर सरकार जमीनों के अधिग्रहण की अधिसूचना पहले ही जारी कर चुकी थी। वैसे तो मायावती सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण के संबंधित विवादों का हल खोजने के लिए दो स्थायी समितियों का गठन किया गया है। क्या इससे मूल समस्या का स्थायी हल निकल पाएगा? अलीगढ़ के इलाके में जिक्रपुर के किसान भूमि अधिग्रहण की दर 449 रुपए प्रति वर्ग मीटर से बढ़ाकर 570 रुपए करने के प्रस्ताव को ठुकरा चुके  हैं। इसी कशमकश में मुआवजे को लेकर किसानों का आंदोलन मथुरा व अलीगढ़ में हिंसा के बाद आगरा तक फैल गया था। इसकी अनुगंूज संसद में व उससे बाहर भी सुनाई दी है। इस कारण  संसद का कार्य भी अवरुद्ध रहा। राष्ट्रीय लोकदल व समाजवादी जनता दल इसे मुद्दा बनाए हुए है। प्रश्न उत्तर प्रदेश का हो, पंजाब अथवा पश्चिम बंगाल सरकारें उस समय तक नहीं जागतीं, जब तक  कि किसान आंदोलन का रास्ता न अपना लें। दिक्कत तब पेश आती है, जब किसानों को शहरीकरण, औद्योगिक विकास तथा अन्य उद्देश्यों के लिए अधिगृहीत की गई जमीन का काफी कम मुआवजा दिया जाता है। पंजाब की मिसाल इससे भिन्न क्यों न रही हो, बाजार भाव के मुकाबले किसानों को काफी कम पैसे दिए जाते हैं। कई बार उनके पुनर्वास का भी पर्याप्त प्रबंध नहीं हो पाता। पश्चिम बंगाल में सिंगुर व नंदीग्राम में कौडि़यों के भाव किसानों की जमीन हथियाने का मामला बराबर सुर्खियों में रहा है। इसके बावजूद इन बातों से सबक नहीं लिया जा सकता। केंद्र व राज्य सरकारें किसानों के हितों को प्राथमिकता देने, उन्हें उनकी उपज का उचित मूल्य  दिलवाने के वादे करती रही हैं, लेकिन अमल के स्तर पर उन्हंे पूरी तरह अमल में नहीं लाया जाता। यही किसानों में बढ़ते हुए असंतोष का कारण बनता है। आंदोलन के नाम पर हिंसा या कानून कृषि से संबंधित समस्याओं का हल आपसी सहमति व विचार-विमर्श के जरिए खोजा जा सकता है। फिर इस तरह के विवादों को लंबा खिंचने का मौका क्यों दिया जाए? उत्तर प्रदेश  की मायावती सरकार अपने नेताओं के भारी स्मारकों पर करोड़ों रुपए फूंकना पसंद करती है, जबकि किसानों के वास्तविक हितों की चिंता न करना उसकी कार्य नीतियों में खोट का परिचायक है। सरकार की कथनी व करनी में अंतर नहीं होना चाहिए, अन्यथा कुछ राजनीतिक तत्त्व इस स्थिति का राजनीतिक लाभ लेने से नहीं चूकेंगे। उत्तर प्रदेश की ताजा घटनाओं को देखते हुए केंद्र व राज्यों को राजनीतिक स्वार्थों से उबर कर इन प्रश्नों पर तर्कसंगत ढंग से गौर करना चाहिए। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में किसानों के हितों की रक्षा होनी ही चाहिए। किसानों का अपनी मांगों को लेकर बार-बार सड़कों पर आना कोई आदर्श स्थिति नहीं है।

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