कैसी खाद्य सुरक्षा

सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर केंद्र को गोदामों में सड़ने वाले गेहूं को सड़ने देने के बजाय निर्धनों में बांटने के लिए आगाह किया है। शेख सादी का कहना है कि यदि कोई नेक सलाह दीवार पर लिखी दिखाई दे, तो उसका अनुसरण किया जाना चाहिए। यहां बात उससे कुछ उलट है। सुप्रीम कोर्ट इससे पूर्व भी इस मामले पर अपनी राय दे चुका है, लेकिन उसका उतना असर नहीं हुआ, जितना कि होना चाहिए था। यही कारण है कि उसे पीडीएस में भ्रष्टाचार के खिलाफ पीपल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टीज द्वारा दायर एक जनहित याचिका के जवाब में फिर से टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने फालतू अनाज को सहेजने के लिए केंद्र को हर राज्य में एक बड़ा गोदाम बनवाने तथा कई जिलों और संभागों में ऐसी व्यवस्था करने के अलावा ऐसा अनाज सड़ते रहने के बजाय भूखे लोगों और निर्धन लोगों तक निःशुल्क उपलब्ध करवाने के निर्देश दिए हैं। यदि ऐसा हो पाए, तो संबंधित वर्ग को उसका लाभ मिल  पाएगा। हकीकत यह है कुछ राज्यों में गरीबी रेखा से नीचे लोगों को निर्धारित 35 किलो  अनाज उपलब्ध नहीं करवाया जा सका है। जहां तक पीडीएस अर्थात जनवितरण प्रणाली का प्रश्न है, उसे लेकर तरह-तरह के सवाल उठाए जाते रहे हैं। इस प्रणाली के तहत निर्धनों को अनाज की अपर्याप्त मात्रा उपलब्ध करवाने के अलावा ऐसा माल रास्ते में ही खुर्द-बुर्द किए जाने की घटनाएं सामने आती रही हैं। दूसरी ओर उचित भंडारण के अभाव में हजारों मीट्रिक टन गेहूं सड़ता रहा है। इनमें यदि पंजाब में 24 हजार तो हरियाणा में 7.5 मीट्रिक टन गेहूं बर्बाद हुआ है। क्या यही वह खाद्य सुरक्षा है, जिसकी हम परिकल्पना करते आए हैं। यह मुद्दा संसद में और उससे बाहर भी उठाया जाता रहा है। केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलवाने तथा भंडारण की समस्या दूर करने के लिए बड़े पैमाने पर उठाने का वादा क्यों न करते रहे हों, स्थिति आज तक गंभीर बनी रही है। इससे इस ओर सरकार की उदासीनता तो जाहिर होती ही है, प्रबंध व्यवस्था की खामियां भी नजर आती हैं। कृषि मंत्री ने पिछले कुछ वर्षों में गेहूं की काफी अधिक खरीद को समस्या का मूल कारण बताया है। यहां यह प्रश्न भी पैदा होता है कि सरकार समय रहते तक इस ओर क्यों चौकस नहीं हो पाई? कुछ राज्यों में कर अधिक होने के कारण निजी व्यापारी भी पीछे हट गए। यह कुछ ऐसे मामले हैं, जिनमें उचित तालमेल बैठाकर सरकार को कोई कारगर कर नीति तय करनी होगी। एक ऐसे देश में जहां दस करोड़ से ज्यादा लोग गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर कर रहे हैं, पर्याप्त भंडारण के अभाव में लाखों टन अनाज सड़ने देना किसी महाअपराध से कम नहीं है। सरकार ने उत्तर प्रदेश में भारतीय खाद्य निगम के कुछ अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई कर प्रशासन में सुधार लाने की पहल जरूर की है, लेकिन समस्या की गंभीरता को देखते हुए कुछ प्रभावी कदम उठाना अभी शेष हैं। देश के किसानों को उचित मूल्य मिलने के साथ खाद्य सुरक्षा भी उतनी जरूरी है।

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