खेल भावना हो तो वाल्श जैसी

एजेंसियां, नई दिल्ली । श्रीलंका के आफ स्पिनर सूरज रणदीव के नो बाल से भारतीय ओपनर वीरेंद्र सहवाग को शतक से वंचित करने ने खेलों में खेल भावना की जरूरत पर फिर से बहस छेड़ दी है। रणदीव जैसे खिलाडि़यों को खेल भावना का सबक वेस्टइंडीज के महान तेज गेंदबाज कर्टनी वाल्श से सीखना चाहिए, जिन्हें खेल भावना को तोड़कर जीत हासिल करना मंजूर नहीं था। टेस्ट क्रिकेट में सबसे पहले 500 विकेट लेने वाले वाल्श को 1987 के एक दिवसीय विश्व कप में पाकिस्तान के खिलाफ मैच में अद्भुत खेल भावना दिखाने के लिए आज भी याद किया जाता है। वेस्ट इंडीज ने 49.3 ओवर में 216 रन बनाए। लक्ष्य का पीछा करते हुए पाकिस्तान का स्कोर नौ विकेट पर 203 रन हो गया। आखिरी ओवर में पाकिसतान को 14 रन चाहिए थे। अब्दुल कादिर ने चौका और छक्का मारते हुए पाकिस्तान को जीत के करीब ला दिया। वाल्श अपने रनअप से गेंद फेंकने के लिए बढ़ चले थे और सलीम जाफर नान स्ट्राइकर छोर से बाहर निकल आए थे। वाल्श रुक चुके थे और उनके पास जाफर को रन आउट कर अपनी टीम को जीत दिलाने का बेहतरीन मौका था, लेकिन उन्होंने जाफर को सिर्फ चेतावनी दी कि वह इस तरह क्रीज से बाहर नहीं निकलें। कादिर ने वाल्श की आखिरी गेंद पर दो रन लेकर पाकिस्तान को जीत दिला दी। वेस्टइंडीज यह मैच हार गया और उसकी सेमीफाइनल में पहुंचने की उम्मीदों का गहरा झटका लगा, लेकिन मैच समाप्त होने के बाद स्टेडियम में दर्शक खडे़ होकर वाल्श के सम्मान में तालियां बजा रहे थे। इस खेल भावना के कारण वाल्श 1987 में विजडन क्रिकेटर आफ दि ईयर बने थे।

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