जननी जन्म भू

हे जननी जन्मभूमि

तुझ पर निछावर

सौ-सौ जन्म मेरे हों

तेरे चरण रज का

तिलक भाल पर लगा

बलिहारी जाऊं मैं तुम पर

मुझ को दे दो ऐसा वरदान

हाथ उठाकर।

सहस्रों जन्म बारम्बार मेरे हों

तुझी पर, दे दो ऐसा वरदान

हाथ उठाकर।

जीवन मूल्य न जाना था

ं अब तक, मैं रहा तिमिर की

धूल फांकता अब तक

तूने दिया ये तन

आत्मा विकसित इसमें

उन वीरों की बलि का प्रकाश

संूघ-सूंघ जाने कौन सुख हृदय में पाकर

मैं बलि-बलि जाऊं

मुझको दे दो ऐसा

वरदान हाथ उठाकर

हे जननी जन्मभूमि

तुझे शत-शत नमन हो।

महेंद्र ठाकुर, धर्मपुर, सोलन

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