जातिवाद से सस्ती लोकप्रियता

बलदेव धीमान, हमीरपुर

दिव्य हिमाचल समाचार पत्र के 14 अगस्त के अंक में छपे लेख ‘अनुसूचित जाति में कौन…?’ पढ़कर ऐसा लगा कि लेखक द्वारा किसी जाति विशेष के  द्वेष व्यक्त कर मन की भड़ास निकालने का प्रयास किया है। शायद लेखक इस बात से अनभिज्ञ है कि केंद्रीय सरकार द्वारा जुलाई 1977 में अनुसूचित जाति व जनजाति से संबंधित नई सूची में कुछ नई जातियों को भी अनुसूचित श्रेणी में लाया गया है, जिस आधार पर हिमाचल प्रदेश सरकार ने अपनी अधिसूचना संख्या बीसी-120/6/34/76-एससीटी-वी दिनांक 27 जुलाई, 1977 जारी कर केंद्र द्वारा जारी अधिसूचना को लागू किया, जिस आधार पर लोअर जाति भी हिमाचल प्रदेश में अनुसूचित जाति में आ गई और सभी इसका लाभ लेने लगे। जहां तक हिमाचल प्रदेश के शिक्षा मंत्री आईडी धीमान के अनुसूचित जाति से संबंधित प्रमाण पत्र को झूठा कहा गया व यह भी कहा गया कि वह इस जाति से नहीं हैं, बड़ा हास्यस्पद है, जो व्यक्ति पांच बार विधानसभा चुनाव लड़ा और पांचों बार जीता व दो बार शिक्षा मंत्री भी बना, तो क्या उनके विरुद्ध चुनाव लड़ने वाले दूसरे राजनीतिक दलों को कभी इसका ध्यान ही नहीं आया या फिर चुनाव आयोग ने जाति प्रमाण पत्र की वैधता की कभी जांच पड़ताल ही नहीं की होगी? शायद तथ्यों को जाने बिना सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का प्रयास किया गया है। जहां तक अनुसूचित जाति आयोग में शिकायत की बात की है, तो लेखक को अपने व्
यक्तित्व विचारों को समाचार पत्रों में प्रकाशित करने की बजाय आयोग के निर्णय की प्रतीक्षा कर लेनी चाहिए
थी, जिस छुआछूत व सामाजिक चेतना की बात लेखक ने की है कि आजादी के 63 वर्ष बाद भी समाज की दशा नहीं बदली है, तो उसके लिए आईडी धीमान जिम्मेदार नहीं हैं। अतः समस्त लोहार-धीमान समुदाय इस प्रकार के विचारों की भर्त्सना करता है और यह भी सलाह दी जाती है कि व्यक्ति विशेष की छवि को धूमिल करने का प्रयास न करें, बल्कि संपूर्ण दलित समाज के उत्थान हेतु आगे आएं।

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