जाति पर फिसल पड़े सब नेता

जिन लोगों के हाथ में हमने देश की पतवार दे रखी है, उनका हाल क्या है, इसका हमें सही-सही पता लग रहा है, जातीय गणना के सवाल से! 2011 की जनगणना में जाति को जोड़ा जाए या नहीं, इस मुद्दे पर हमारे प्रमुख राजनीतिक दलों का दिग्भ्रम आश्चर्यजनक है।  यहां मैं उन दलों की बात नहीं कर रहा हूं, जो पूर्णतः जातिवादी हैं, मूलतः प्रांतीय हैं और निजी कंपनियों की तरह चल रहे हैं। मेरी चिंता उन दलों के बारे में है, जो राष्ट्रीय हैं, जिन्होंने देश का नेतृत्व किया है और जो वास्तव में भारत की विविधता का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनका दावा है कि वे किसी न किसी विचारधारा का प्रतिनिधित्व भी करते हैं। ये दल हैं कांगे्रस, भाजपा और कम्युनिस्ट पार्टियां। इन तीनों प्रमुख पार्टियों का रवैया क्या है? इन तीनों पार्टियों ने संसद के पिछले सत्र में जातीय गणना के लिए अचानक अपनी सहमति तो दे दी, लेकिन वे चक्रव्यूह में फंस गए। अब उन्हें बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिल रहा है।  जातिवादी दलों की मांग पर इन तीनों दलों ने कह दिया कि हां, जनगणना में जाति को जोड़ लिया जाए। सदन में कोई खास सोच-विचार नहीं हुआ। बाद में कुछ प्रमुख नेताओं ने बताया कि यह सोचकर ज्यादा चीर-फाड़ नहीं हुई कि यदि जरूरतमंदों को आरक्षण देना है, तो उनकी गिनती क्यों न कर ली जाए? अब तक आरक्षण का आधार जाति रही है और जाति के आंकड़े आखिरी बार 1931 में इकट्ठे किए गए थे, वे पुराने पड़ गए हैं। नए आंकड़ों से बेहतर नीति बनेगी। अपनी हामी जताते हुए नेताओं ने यह नहीं सोचा कि आखिर अंग्रेज ने 70 साल (1861-1931) तक जिस जाति- नीति पर अपना माथा खपाया, उसे उसने छोड़ क्यों दिया? क्या कारण था कि 1931 की जनगणना के अंग्रेज कमिश्नर डा. जेएच हट्टन ने जातीय जनगणना को अवैज्ञानिक, मिथ्या और विभ्रमकारी कहा था? हमारे सांसदों ने यह भी नहीं सोचा कि हमारे संविधान-निर्माताओं ने बार-बार जातिविहीन समाज बनाने की बात क्यों कही थी और उन्होंने जातीय गणना को दोबारा शुरू करने की बात क्यों नहीं की? जातीय गणना के समर्थक यह भी भूल गए कि आजाद भारत की जितनी भी सरकारें आईं, किसी ने भी जातीय गणना को उचित नहीं माना। ध्यातव्य यह भी है कि पिछले चुनाव में सारे राजनीतिक दलों ने अपने घोषणापत्रों में छोटे-मोटे मुद्दे तो उठाए, लेकिन किसी भी दल ने, यहां तक कि जातिवादी दलों ने भी जातीय गणना का मुद्दा छुआ तक नहीं। ऐसी हालत में भारत की जनता के सीने पर जातिवाद के भूत को अचानक सवार कर देना कहां तक उचित है? जनगणना में जाति को जोड़ना हमारे स्वाधीनता-संग्राम के मूल्यों का निषेध है। स्वयं कांग्रेस ने 11 जनवरी, 1931 को जनगणना बहिष्कार दिवस मनाया था।  जातीय गणना हमारे संविधान की आत्मा का भी उल्लंघन है। डा. बाबा साहेब अंबेडकर और जवाहर लाल नेहरू ने जातीय विभाजन को राष्ट्रीय एकता का दुश्मन बताया था। हमारे संविधान में जातीय आधार पर आरक्षण या संरक्षण देने की बात कहीं भी नहीं कही गई है। जातीय गणना का मुद्दा इतना संगीन है कि इसका असर आने वाली कई सदियों और पीढि़यों पर पड़ेगा। यह मामला उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना कि हमारे संविधान का मूल ढांचा है। इस मूल ढांचेको न तो संसद बदल सकती है और न ही अदालत। इस मूल ढांचे का असर देश की राजनीति और प्रशासन पर पड़ता है, लेकिन जातिवाद का कैंसर तो भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक ढांचे को ही नष्ट कर देगा, इसलिए इस मुद्दे पर 10 मंत्रियों का समूह या संसद में बैठे कुछ नेता अचानक फैसला कर लें, यह सर्वथा अनुचित होगा।  सच्चाई तो यह है कि मामला समूची संसद के सामने पेश होना चाहिए,  लेकिन संसद के सामने लाने के  पहले इस मामले पर संसद की सर्वदलीय समिति को सांगोपांग विचार करना चाहिए। यह समिति पहले तो समस्त विधानसभाओं से राय मांगे। फिर देश के अनुभवी विधिशास्त्रियों, नेताओं, जनगणना विशेषज्ञों, सांस्कृतिक संगठनों, युवजनों, जातिवादियों, जाति विरोधियों-सभी से विचार-विमर्श करें। यह मुद्दा इतना महत्त्वपूर्ण है कि इस पर प्रवासी भारतीयों का अभिमत भी लिया जाना चाहिए। समिति की सुविचारित रपट पर संसद बहस करे और फिर वह जो भी निर्णय करे, उसे मान्य किया जाए। यह प्रस्ताव इस आधार पर रखा जा रहा है कि हमें पूरा विश्वास है जो नेता वोटों के लालच में फंसकर जातीय गणना की मांग कर रहे हैं, वे भी राष्ट्रप्रेमी हैं और विवेकवान हैं। संसदीय समिति की रपट यह करेगी कि उन्हें वह दूरंदेश भी बना देगी, जिन दलों का शुरू में मैंने जिक्र किया था, वे अचानक संसद में फिसल गए।  कौन नहीं फिसला? आज देश के सारे नेता एक तरफ खड़े हैं और सारा आधुनिक और भावी भारत दूसरी तरफ खड़ा है। नेता 18वीं सदी में हैं और जनता 21वीं सदी में! जब से ‘सबल भारत’ के ‘मेरी जाति हिंदोस्तानी’ आंदोलन ने जोर पकड़ा है, नेताओं को अपनी भूल समझ में आ गई है, लेकिन अब वे पलटा कैसे खाएं? कम्युनिस्ट पार्टियों ने, जो हमेशा जाति के मुकाबले वर्ग को खड़ा करती रही हैं, आज अपनी स्थिति हास्यास्पद बना ली है, वे कह रही हैं सब जातियों को नहीं, सिर्फ पिछड़ी जातियों की गिनती कर लीजिए। इन कामरेडों से कोई पूछे कि देश में कौन सी जाति ऐसी है, जिसमें सब विपन्न और सब संपन्न हैं? यह जातीय जनगणना उनके कौन से वर्ग-विश्लेषण में फिट होती है। कम्युनिस्टों से भी ज्यादा विकट स्थिति कांगे्रस की है। वह सत्तारूढ़ पार्टी है, जो भी पाप चढ़ेगा, उसके माथे आएगा। उसके नेता आपस में ही दंगल कर रहे हैं। मंत्रिसमूह के नेता प्रणब मुखर्जी ने जो पत्र सभी दलों को भिजवाया है, वह बीरबल की पहेली से कम नहीं है।  कई विरोधी नेता एक-दूसरे से पूछ रहे हैं कि इसका क्या जवाब दें? प्रणब दा ने पूछा है कि क्या जनगणना में जाति का प्रचार किया जाए कि व्यक्ति-गणना की शुद्धता नष्ट न हो?  हमारे नेता शब्दों की चिलमन डालकर बैठे हैं। साफ छुपते भी नहीं, सामने आते भी नहीं। भाजपाई और कांग्रेसियों को तय करना है कि यह देश जातिवादी पटरी पर चले और राष्ट्रवादी पर!  इतिहास दोनों के मुख पर कालिख पोतेगा या तिलक लगाएगा, लेकिन दोनों एक-दूसरे के कंधे पर बंदूक रखने में जुटे हुए हैं। कोई भी बिल्ली के गले में घंटी बांधने को तैयार नहीं है। दोनों को पता है कि जातीय गणना कितनी विनाशकारी है, लेकिन दोनों को डर है कि वे जातीय गणना का विरोध करेंगे, तो उनके वोट कट जाएंगे, यह डर झूठा है। वे यह भूल जाते हैं कि पिछले आठ साल में भारत की जनता ने कई बार जातीय समीकरण को उलट दिया है। यदि 21वीं सदी की राजनीति शुद्ध जातीय आधार पर चलेगी, तो कांगे्रस और भाजपा जैसी पार्टियों का नामोनिशान भी नहीं बचेगा। असली समस्या है कि हमारा देश आज नेतृत्वविहीन हो गया है। जनता तो नेताओं के पीछे चलती है, लेकिन नेताओं को यह पता नहीं कि वे कैसे चलें?

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