दक्ष चिकित्सकों का इंतजार

हिमाचल में डेढ़ सौ स्थायी चिकित्सकों की नियुक्ति से विभागीय दक्षता में बढ़ोतरी होगी। मंत्रिमंडल के इस फैसले का दूरगामी असर होगा, खासकर जहां पेशेवर जरूरतें दिखाई दे रही हों, वहां नियुक्तियों के पैमाने हमेशा लबालब चाहिएं। आज की तारीख में स्वास्थ्य विभाग के सरकारी लक्ष्य, विभागीय कसौटियों के आगे ही कमजोर पड़ रहे हैं। ऐसे कई चिकित्सालय हैं, जहां आवश्यक सुविधाओं के बावजूद सेहत महकमा अपनी उपयोगिता साबित नहीं कर पाता। यह चिकित्सक पदों की रिक्तियों या व्यवस्थागत पदों की नियुक्तियों से महरूम होने के कारण होता है। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग की इकाइयां केवल मरीजों को आगे धकेलने का काम करती हैं। दुर्भाग्यवश उपमंडल या जिला मुख्यालयों पर स्थित अस्पतालों को सुदृढ़ न करने के कारण पूरी व्यवस्था की हालत खराब हुई है। यह दीगर है कि उपकरणों की खरीद व वितरण में स्वास्थ्य विभाग ने कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन आवश्यकतानुसार डाक्टरों या पैरामेडिकल स्टाफ के पद नहीं भरे गए। आज टांडा मेडिकल कालेज जैसे संस्थान में न्यूरो सर्जरी या एंडोस्कोपी सुविधा उपलब्ध नहीं है, तो मरीजों का रुख किधर जाएगा। ऐसे में जरूरी यह भी है कि प्रदेश के सर्वोच्च स्वास्थ्य संस्थानों को पूरी तरह सक्षम करें। प्रदेश का सेहत महकमा अस्पतालों की पूर्ण क्षमता के दोहन का खाका बनाकर यह सुनिश्चित करे कि वहां तैनात कर्मचारी हमेशा तत्पर रहें। जनता की चिकित्सीय जरूरतें एक छोटी सी बीमारी के सही तरीके से निरीक्षण से पूरी होती हैं, लेकिन पद्धति कुछ ऐसी है कि छोटे संस्थान अपनी जिम्मेदारी को आगे सरका रहे हैं। बिना किसी सर्वेक्षण से यह जानना मुश्किल है कि हिमाचल मंे किस बीमारी के लिए अधिक विशेषज्ञ डाक्टर चाहिएं। एक मोटे अनुमान के अनुसार सबसे अधिक पथरी के मरीज बाहरी प्रदेशों का रुख करते हैं, लेकिन इस इतिहास को पलटने की कोशिश किस सरकारी चिकित्सालय में हुई। ऐसे में अगर प्रदेश के सभी क्षेत्रीय अस्पतालों को किसी न किसी रोग विशेष का अग्रणी संस्थान बनाया जाए, तो बाहर जाने के बजाय, मरीज प्रदेश के भीतर सुविधाएं पा सकते हैं। प्रदेश के क्षेत्रीय या जिला अस्पतालों को पूर्ण सुविधाओं के साथ-साथ किसी एक रोग विशेष के राज्य अस्पताल का दर्जा भी मिलना चाहिए। इस तरह प्रदेश में प्रमुख रोगों के दृष्टिगत कई सुपरस्पेशियलिटी अस्पताल बन जाएंगे। प्रदेश के छोटे-बड़े समस्त अस्पतालों के प्रबंधन की जब तक स्थायी व्यवस्था नहीं होती, चिकित्सीय अधोसंरचना का पूर्ण इस्तेमाल नहीं होगा। बहरहाल प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं में डेढ़ सौ स्थायी व आरकेएस के तहत अतिरिक्त 63 चिकित्सकों की नियुक्ति से प्रदेश के कई अस्पताल रोगमुक्त हो सकते हैं, लेकिन रोगी कल्याण समितियों के तहत साढ़े तीन सौ डाक्टरों का असंतोष किसी भी संदर्भ में अच्छा संकेत नहीं दे रहा। चिकित्सीय सेवाओं में आक्रोश के ऐसे मजमून भी पूरी तरह संबोधित होने चाहिएं।

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