धक्का स्टार्ट एचआरटीसी

सामाजिक क्षेत्र में दायित्व निर्वहन करने के दावे करने वाली एचआरटीसी शायद ही कोई ऐसा वर्ष रहा होगा, जब घाटे का राग अलापते न थकी हो। धूमल सरकार ने निगम की पतली हालत के चलते वित्तीय ग्रांट 80 करोड़ तक कर दी है। बावजूद इसके निगम का घाटा कम होने का नाम नहीं ले रहा। एचआरटीसी का कुल घाटा 512 करोड़ बताया जाता है। हैरानी की बात है कि हाल ही में बढ़े किराए से पहले भी घाटा 512 करोड़ था और बाद में भी यह 512 करोड़ ही है। बढ़ा हुआ किराया कहां गया, भगवान जाने। निगम के सालाना घाटे की दर 43 करोड़ के लगभग बताई गई है। निगम के 920 रूट घाटे में बताए गए हैं। 520 के लगभग बसें जीरो बुक वैल्यू की हैं। बसों में सफाई व्यवस्था रामभरोसे रहती है। बसों की सफाई के लिए कई बस अड्डों में इंतजाम तो हैं, मगर अफसरों को इनकी निगरानी व निरीक्षण करने का शायद वक्त नहीं रहता। यही नहीं निगम की बसों में सफर करने वाले आम यात्री चालकों व परिचालकों की रूखी जुबान की शिकायत करते नहीं थकते। ढाबों में बसें वहां रोकी जाती हैं, जहां यात्रियों को तो चपत लगे, मगर चालक व परिचालकों की सेवा पूरी होती हो। हालांकि परिवहन मंत्री किशन कपूर से लेकर मौजूदा परिवहन मंत्री महेंद्र सिंह ने इस व्यवस्था में सुधार के लिए खूब ऐलान किए, मगर मौके पर व्यवस्था की पोल खुलती दिखती है। यही नहीं अंतरराज्यीय रूटों पर भी बसें वहीं रोकी जाती हैं, जहां चालकों व परिचालकों का गर्मजोशी से स्वागत करने की व्यवस्था हो।

 आम लोगों की मानें, तो यदि परिवहन मंत्री इस व्यवस्था का खुद औचक निरीक्षण करें तभी सुधार आ सकता है। यात्रियों की आम शिकायत रहती है कि निगम बसों की सीटें आरामदेय नहीं होती, जबकि निजी बसों में सफाई व्यवस्था से लेकर अन्य सुविधाएं उपलब्ध रहती हैं। यही वजह बताई जाती है कि निजी बस बेडे़ का आकार हर साल बढ़ रहा है, जबकि एचआरटीसी का बेड़ा वहीं का वहीं खड़ा है। निगम के पास 1900 बसें हैं, जबकि निजी बसों की संख्या 2700 का आंकड़ा भी पार कर गई हैं। प्रदेश के परिवहन विभाग को एचआरटीसी के सेकेंडमेंट आधारित कर्मी पिछले छह वर्षों से दौड़ा रहे हैं। इस स्टाफ में कंडक्टर, वर्कशॉप में कार्यरत रहे कर्मी, इंस्पेक्टर 50 फीसदी स्टाफ की दर से तैनात हैं। महत्त्वपूर्ण विभाग में 60 पद खाली हैं। कई इलाकों में आरटीओ के तहत अधीक्षक व क्लर्कों तक की तैनाती नहीं की गई है। प्रदेश के 11 बैरियरों में सेकेंडमेंट आधारित कर्मी तैनात किए गए हैं। शहरों में परिवहन व्यवस्था जवाब दे चुकी है। प्रदेश की राजधानी शिमला की ही बात करें, तो यहां छोटा या बड़ा वाहन 15 की गति से शिमला से ढली तक का सफर एक घंटे में तय करता है। परिवहन विभाग को इस बात की कभी भी सुध नहीं लग सकी कि इसमें सुधार कैसे किया जाए।

नई बसों के पंजीकरण के लिए कोई मापदंड नहीं है। शहर में कितने वाहन ढोने की क्षमता है। इसका कभी भी सर्वे तक करने की सोच नहीं रखी गई। परिवहन विशेषज्ञों की मानें तो आने वाले दस वर्षों में शिमला ही नहीं प्रदेश के 56 शहरों में यह व्यवस्था बड़े सवाल खड़े कर सकती है। यही नहीं परिवहन विभाग ने जल परिवहन सुधार के लिए केंद्र से करीबन पांच वर्ष पहले 10 करोड़ रुपए का जैटी प्रोजेक्ट मंजूर करवाया था, केंद्र ने रकम भी जारी की। इससे बिलासपुर के गोबिंदसागर जलाशय के विभिन्न घाटों का सुधार अत्याधुनिक तकनीक से किया जाना था, मगर विभाग को तकनीक ही नहीं मिल सकी। इसके बाद वर्ष 2007-08 में हिम ग्रामीण स्वरोजगार योजना चलाई गई। इसका हश्र भी जैटी प्रोजेक्ट की ही तरह हुआ।

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