धक्का स्टार्ट राज्य परिवहन

सरकारी विभाग हो अथवा सरकारी उपक्रम, जब जनता की खून-पसीने की कमाई पर सरकारी कुप्रबंधन की कैंची चलाई जाए, तो मीडिया का दायित्व बनता है कि ऐसी बुराई-धांधली का पर्दाफाश किया जाए। इस संदर्भ में आठ अगस्त को ‘दिव्य हिमाचल’ में प्रकाशित खबर ‘धक्का स्टार्ट एचआरटीसी’ जिसमें  निगम के कड़वे सच को जनता के सम्मुख प्रस्तुत किया, इसके लिए आप बधाई के पात्र हैं। वास्तव में कथित लेख का शीर्षक ‘धक्का स्टार्ट राज्य परिवहन’ ज्यादा न्यायसंगत लगता है, क्योंकि इसमें प्रदेश सरकार व परिवहन विभाग भी बराबर का जिम्मेदार है। इस मामले पर मई माह में प्रकाशित लेख ‘एचआरटीसी को डुबो रही परिवहन नीति’ पर उचित विचार करके क्रियान्वित किया गया होता, तो धक्का स्टार्ट एचआरटीसी की नौबत नहीं आती। आजकल टायरों की कमी, नकली स्पेयर पार्ट्स के कारण बसों का पथ विभंग होना आम बात बन चुकी है। अनुबंध पर गत 10-12 वर्षों से सेवारत कर्मी नियमित नहीं हुए। निगम में घाटे के बावजूद अनावश्यक खरीद-फरोख्त बरकरार है। प्रबंधकों की फौज एवं खर्चा दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है, परंतु पथ परिवहन उचित प्रबंधन एवं सैद्धांतिक नीति को तरस रहा है। संयुक्त समयसारिणी को नजरअंदाज करना, स्पेयर निजी बसों का अवैध चालन, यहां तक कि कार-स्कूटर के नंबर प्लेट बस पर लगाकर यात्री ढोना फैशन बन चुका है। संभवतः निजी क्षेत्र पथ परिवहन पर हावी हो गया लगता है। जहां तक निगम के विनिवेश करने का प्रश्न है। पथ परिवहन लाहुल-स्पीति एवं चंबा के दुर्गम क्षेत्रों में परिवहन सेवाएं प्रदान करता है। समाज के भिन्न-भिन्न वर्गों को मुफ्त यात्रा व रियायती बस सेवा प्रदान करता है। निजी बसों से वर्ष में 314 दिन का टैक्स लिया जाता है, जबकि निगम को ऐसी छूट नहीं है। निजी 2700 बसों का कुल टैक्स निगम की 1900 बसों के लगभग बराबर है। निजी बसों द्वारा निगम में तैनात कर्मियों से कम लोगों को रोजगार दिया जाता है। इसके अलावा अधिकतर निजी बसें कम किराया लेकर यात्रियों को ढोती हैं, तो ऐसे में पथ परिवहन को खुदा ही बचा सकता है।

रघुबीर सिंह, सेराथाना

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