नहीं टूटा लाल तिलिस्म

हामिद खान, चंबा

नेताओं की नर्सरी कही जाने वाली केंद्रीय छात्र संघ के चुनावों में जहां एसएफआई ने साल दर साल अपना ग्राफ ऊंचा किया है तथा अपने वोट बैंक में बढ़ोतरी की है, वहीं अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के वोट बैंक में कमी दर्ज हुई है। अगर आंकड़ों पर नजर दौड़ाई जाए, तो राजकीय महाविद्यालय में पिछले तीन वर्षों में एसएफआई ने अपनी स्थिति मजबूत की है। वर्ष 2008-09 में एसएफआई का सफाया हो गया था तथा चारों सीटें हारने के बाद चंद क्लास प्रतिनिधि ही उनके हिस्से में आए थे। उस वर्ष मुख्य चार सीटों में एनएसयूआई तथा एबीवीपी को दो-दो सीटें मिली थीं। वर्ष 2009-10 में सत्ता परिवर्तन के साथ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद हाशिए पर आ गई, जबकि अध्यक्ष का पद एसएफआई ने जीता तथा बाकी तीन पद एनएसयूआई ने जीते थे। इस बार के चुनावों में शुरू से ही चुनावी टक्कर एसएफआई और एनएसयूआई में थी तथा चुनाव परिणाम भी वैसे ही आए, लेकिन इस बार एसएफआई ने अपनी ताकत में इजाफा कर एक सीट की बढ़ोतरी कर ली। एनएसयूआई एक सीट से पिछड़ गई, मगर एबीवीपी यहां अपना खाता ही नहीं खोल पाई। इसी प्रकार बनीखेत में एनएसयूआई ने अध्यक्ष पद एबीवीपी से छीन कर अपना खाता खोला है, जबकि पिछली बार वह सभी सीटों पर हारी थी। चुवाड़ी में इस बार एनएसयूआई ने अपनी ताकत बढ़ाई है। पिछले वर्ष खाता न खोल पाई एनएसयूआई ने तीन सीटें एसएफआई से छीनी हैं, जबकि एसएफआई को मात्र एक सीट पर ही संतोष करना पड़ा है। सलूणी कालेज में इस बार एनएसयूआई ने महासचिव का पद जीता है। इसी प्रकार तीसा में एनएसयूआई का अध्यक्ष तो बन गया, मगर उसे एक सीट का घाटा रहा। यहां अन्य सीटें एबीवीपी ने जीतीं। उधर, भरमौर में इस बार उल्टा हुआ। पिछली बार जहां एनएसयूआई तीन तथा एबीवीपी की एक-एक सीटें थीं। इस बार तीन एबीवीपी तथा एक सीट एनएसयूआई ने जीती। कुल मिलाकर एसएफआई ने बाकी संगठनों के मुकाबले अपनी स्थिति मजबूत
की है।

You might also like