नेकी कर कुएं में डाल

किशन सिंह गतवाल, सतौन, सिरमौर

भारत-प्रदत्त पाकिस्तान को 50 लाख डालर की बाढ़ पीडि़तों के लिए आर्थिक सहायता निःसंदेह सदाशयता तथा दरियादिली की एक अनुपम मिसाल है। बड़ी नानुकर के बाद पाकिस्तान ने उपरोक्त सहायता कबूल की। इसके लिए उसकी शायद अनुनय-विनय भी करनी पड़ी हो। ऊपर से भारतीय सहायता कर्मियों को वीजा नहीं दिया गया, इससे देश की बड़ी किरकिरी हुई। क्या भारतीय सहायता सुपात्र को ही मिली? शायद चीन पाकिस्तान के कहीं अधिक नजदीक बैठता है। उसे ही पाकिस्तान की अधिक चिंता होनी चाहिए। यह आर्थिक मदद क्या बाढ़ पीडि़तों को ही मिलेगी या आतंकवादियों को खुलूस के रूप में वापस आएगी? ये कुछ प्रश्न हैं, जो उत्तर की अपेक्षा रखते हैं। इतिहास के कुछ ही पन्ने पलटने पर हमें 1948, 1965 तथा 1971 की याद आ जाएगी।  समझौता एक्सप्रेस के साथ कारगिल हुआ। फिर मुंबई आक्रमण हुआ, बार-बार विफल वार्ताएं और पड़ोसी की भूमि से आतंकी गतिविधियों का संचालन, ये सभी बातें बरबस ही याद आ जाती हैं। बीस वर्षों से आतंक का दंश और मार झेलता भारत फिर भी यदि दोस्ती का हाथ बढ़ाता है, तो उसकी महानता और देवत्व ही हो सकता है। देश का विभाजन करवाने वाला तथा भारत से टक्कर लेने वाला पाकिस्तान क्या वास्तव में भारत से सच्ची मैत्री निभाएगा? काश! वह भी उसी चश्मे से देखे, जिससे हम देख रहे हैं। वह भी एक अच्छे पड़ोसी का
धर्म निभाए।

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