परमाणु विधेयक में रोड़ा

 परमाणु दायित्व विधेयक में किए गए ताजा संशोधनों पर संसद में विपक्ष भाजपा और वामदलों के विरोध के चलते सरकार का किसी उपयुक्त बदलाव के लिए तैयार होना विधेयक पर सहमति जुटाने की ही एक पहल है। संसदीय कार्य राज्य मंत्री पृथ्वी राज चव्हाण ने सरकार के विधेयक पर फिर विचार-विमर्श पर राजी होने का संकेत भी दिया है। वैसे तो प्रायः सभी दल परमाणु दायित्व विधेयक के प्रारूप को अपनी मंजूरी दे चुके थे, लेकिन अब आपत्ति सरकार द्वारा अंतिम समय विधेयक के उपबंध 12 (बी) को लेकर है, जिसके तहत विदेशी आपूर्तिकर्ताओं के जिम्मेदारी जैसे पक्ष को हल्का कर दिया गया है। इससे परमाणु संयंत्रों के लिए सामग्री की आपूर्ति करने वाले देशों को उनकी जवाबदेही से भी मुक्त करने की कोशिश की गई है। इसी तरह दुर्घटना आदि की जवाबदेही आपरेटर पर डाली गई है। विधेयक के इस प्रावधान पर जहां आपत्ति होना स्वाभाविक है, वहीं यह पेशकश कुछ नए सवाल भी पैदा करती है। यही कारण है कि इनका समाधान न होने तक विपक्ष ने इसे मंजूर न करने की बात कही है। यह ऐसे संवेदनशील मुद्दे हैं, जिनकी अनदेखी कर उन्हें व्यवहार में लाना वाजिब न होगा। यही कारण है कि इस बार भी संदेह इरादों पर व्यक्त किया गया है। उक्त विधेयक को अंतिम रूप देने वाली संसद की स्थायी परमाणु दुर्घटना की हालत में मुआवजे की राशि 500 करोड़ से बढ़ाकर 1500 करोड़ करवाने का श्रेय क्यों न ले रही हो, आपूर्तिकर्ताओं को उनकी जवाबदेही से मुक्त करना उचित नहीं होगा। एक ओर तो परमाणु बिजली निगम आगाह कर रहा है कि ऐसे में कोई भी भारतीय या विदेशी निर्माता अपनी सेवाएं नहीं दे पाएगा। विशेषकर जबकि आपूर्तिकर्ता की लापरवाहियों का ठीकरा परिचालक के सिर फोड़ा जाना है। परमाणु क्षतिपूर्ति दायित्व विधेयक को अंतिम रूप देते समय व्यापक राष्ट्रीय हितों को मद्देनजर रखा जाना उतना ही जरूरी है, जितना कि आपूर्तिकताओं के लिए जहां तक संभव हो, अव्यावहारिक प्रावधानों के बिना सच्चाई का रास्ता सुलभ करवाना। विधेयक के उपबंध 17 (बी) में आपरेटर को सप्लायर के खिलाफ किसी परमाणविक दुर्घटना की हालत में जाने का अधिकार दिया गया है, बशर्ते कि यह साबित हो सके कि आपूर्तिकर्ता या उसके कर्मचारी परमाणु दुर्घटना होने का इरादा रखते थे। यह स्वयं में न केवल एक जटिल प्रश्न है, बल्कि आपूर्तिकर्ता को बचाने का प्रयास भी है। यही कारण है कि भाजपा ने परमाणु साजो-सामान सप्लाई करने वाले आपूर्तिकर्ताओं को शह देने वाले किसी भी नियम को मानने से इनकार किया है। वैसे तो भाजपा परमाणु दायित्व विधेयक और परमाणु नीति से जुड़े प्रमुख मुद्दों पर यूपीए सरकार का साथ देती आई है। इस पर भी यदि उसे कुछ पहलुओं पर एतराज है, तो उसका स्पष्टीकरण देना सरकार का दायित्व बनता है। विपक्ष आज भी इस विधेयक को मूल रूप से लाने की मांग पर अडिग है। माकपा इसमें ताजा संशोधन को स्थायी समिति की सिफारिशों के विपरीत मानती है। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि संबंधित पक्ष पर देश व विपक्ष को विश्वास में लेकर आम सहमति जुटाने की पहल की जाए। ऐसे मामले को बार-बार राजनीतिक दुर्भावना या प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाते रहना भी वाजिब नहीं है।

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