पूजा पद्धति संवारने का प्रश्न

हिमाचली मंदिरों में मंत्रोच्चारण पर एक बार फिर कुछ शिकायतों ने, पूजा पद्धति को संवारने का यक्ष प्रश्न रखा है। इससे पूर्व भी मंदिर परंपराओं में उच्च प्रशिक्षण की कमी महसूस की जाती रही है। खासतौर पर जब पूर्व राज्यपाल स्वर्गीय विष्णुकांत शास्त्री ने इसी विषय पर गंभीरता से सोचने पर मजबूर किया था, तो पूजा पद्धति पर मंथन शुरू हुआ था। मंदिरों के पुजारी तथा पूजा पद्धति के लिहाज से प्रशिक्षण लाजिमी हो जाता है। दक्षिण भारत के मंदिरों में मंत्रोच्चारण तथा पूजा पद्धति की पवित्रता को, अध्यात्म के शिखर तक पहुंचाने की व्यवस्था है। इसी के चलते आंतरिक अनुशासन के साथ-साथ धार्मिक अध्ययन की कई परंपराएं जीवंत हुई हैं। बेशक हिमाचल में भी मंदिर व्यवस्था पर उच्च स्तरीय समितियों का गठन होता रहा है, लेकिन सिफारिशों के बिंदु आज भी सरकारी पहरे में कैद हैं। पिछले साल मंदिर समिति के अध्यक्ष केसी शर्मा ने जो प्रतिवेदन सरकार को सौंपा है, उसमें मंदिर व्यवस्था का यथार्थ कई प्रश्न पूछ रहा है। हैरानी की बात है कि कई देवालयों में प्रतिमाओं के आकार व प्रकार भी धार्मिक निर्देशों की सही पालना नहीं कर रहे हैं। इतना ही नहीं, मूर्तियों की व्याख्या तथा आवश्यक श्लोक इत्यादि की कमी खलती है। मंदिरों की प्रशासनिक व्यवस्था में कुछ अधिकारियों की नियुक्ति से शायद ही परंपराओं के अध्ययन की फुर्सत मिले। मंदिर व्यवस्था को समझने व निखारने के लिए जब तक एक केंद्रीय ट्रस्ट या प्राधिकरण नहीं बनता, शायद ही वास्तविक परिवर्तन आए। यह दीगर है कि सरकारी नियंत्रण में मंदिरों के परिसरों में निखार आया है तथा यात्रियों को मूलभूत सुविधाएं मिल रही हैं, लेकिन पूजा-अर्चना की शैली के धार्मिक उच्चारण दुरुस्त नहीं हुए। यह तभी संभव होगा यदि तमाम मंदिरों के विकास में समरूपता व पूजा पद्धति के महत्त्व को धार्मिक शृंगार का वास्तविक चेहरा मिले। हिमाचल की मंदिर परंपराओं व देव संस्कृति के नेतृत्व को केंद्रीय ट्रस्ट के अलावा एक ऐसा संस्थान मिले, जो अध्ययन व शोध की जरूरतें पूरी करे। प्रदेश की धार्मिक जिज्ञासा व धार्मिक पर्यटन की उत्कंठा को शांत करने के लिए अलग से विद्यापीठ स्थापित की जा सकती है ताकि मंदिरों में श्रद्धालु व्यापक जानकारी तथा प्रभावशाली पूजा पद्धति से रू-ब-रू हो सकें। कुछ समय पूर्व चामुंडा व ज्वालामुखी मंदिरों को कला केंद्र के रूप में विकसित करने की घोषणा हुई थी। संगीत व कला की शिक्षा के लिहाज से हर मंदिर परिसर भारतीय परंपराओं का दर्पण हो सकता है। चामुंडा मंदिर में शास्त्रीय संगीत को लेकर काफी अच्छे प्रयास हुए हैं, जबकि कई अन्य मंदिरों में लोक गायकी की परंपराएं वर्षों से चल रही हैं। उदाहरण के लिए ज्वालामुखी मंदिर में सायं से रात तक लोक गायकों की मंडली का आकर्षण, हिमाचली विविधता के दर्शन कराता है। इसी तरह प्रत्येक मंदिर की आरती व पूजा विधि की अपनी अलग पहचान है, लेकिन इसे परिमार्जित करने की आवश्यकता है। प्रदेश में दूरदर्शन व रेडियो के माध्यम से विभिन्न मंदिरों की आरतियों का सीधा प्रसारण जहां अभिलषित है, वहीं समय रहते मंदिर समिति की सिफारिशों को प्रभावशाली ढंग से अमल में लाने पर गौर करना होगा।

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