प्रधानमंत्री का मंत्र

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राज्यों के पुलिस महानिदेशकों के सम्मेलन को संबोधित करते हुए जिन मुद्दों को  उठाया है, वे आज की स्थिति में विचारणीय हो सकते हैं। उन्होंने कश्मीर में जनता के बेकाबू होने पर चिंता व्यक्त करते हुए पुलिस को आंदोलन कर रही भीड़ पर काबू पाने का मंत्र भी सौंपा है, जो गांधीवादी सिद्धांतों से मेल खाता है। यह मंत्र उग्रवाद तथा कुछ समय से राज्य में सुरक्षा बलों पर की जाती रही पत्थरबाजी पर काबू पाने में कहां तक सफल हो सकता है, यह एक जुदा सवाल है, लेकिन उनकी भीड़ पर काबू पाने के लिए घातक तरीका अपनाने से बचने और ऐसे उपाय जान को खतरा
पैदा न होने देने की नसीहत, उसके कुछ बेहतर विकल्प खोजने में मदद कर सकती है। उनका यह संदेश पुलिस
कार्रवाई से खफा जनता पर भी असर डालता है। प्रधानमंत्री की यह सोच काबिले तारीफ हो सकती है, लेकिन यहां पर प्रश्न भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है कि क्या सांप को बराबर दूध पिलाने से या उसके प्रति नरम रवैया अपनाने से वह अपना स्वभाव बदल देगा? वह भी ऐसी उग्र स्थितियों में जब देश की सुरक्षा व अखंडता दांव पर लगी हो, क्या सुरक्षा बलों के फुफकार के भय को क्षीण कर देना वाजिब होगा? यहां इस तथ्य को क्यों भुलाया जाता है कि इस वर्ष जून माह से घाटी में जारी हिंसा के दौरान जहां कम से कम 60 आम लोग मारे गए हैं, वहीं अनेक सुरक्षा कर्मी भी निशाना बने हैं। प्रधानमंत्री ने जम्मू-कश्मीर में उग्रवाद के मामलों में कमी आई बताई है। ऐसा हुआ भी है, परंतु घाटी में जिस तरह राष्ट्र विरोधी तत्त्व आए दिन बंद और हड़ताल के साथ उग्र प्रदर्शन पर आमादा रहते हैं, वह हमें क्यों नहीं दिखाई देता? भटके हुए नागरिकों द्वारा पत्थरबाजी पर उतरना एक विकृत प्रवृत्ति का सबूत नहीं तो क्या है? घाटी में पाक परस्त तत्त्वों द्वारा  बार-बार मानवाधिकारों के हनन का भूत खड़ा किया जाता है। कुछ समय पूर्व सेना को घाटी से हटाने की मांग उठी थी। प्रश्न नक्सली हिंसा का हो या कश्मीर में पाकिस्तान के इशारों पर नाचने वाले राक्षसों का, बातचीत का रास्ता अपनाना निश्चय ही फलदायी हो सकता है। क्या उसके लिए हिंसा का मार्ग छोड़ना जरूरी नहीं है। घाटी में सुरक्षा बल भी कुछ हद तक ज्यादती के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं। उस पहलू पर प्रधानमंत्री की ताजा नसीहत के चलते गौर होना चाहिए। इस संदर्भ में घाटी के लिए उचित रणनीति अपनाना और जरूरत के मुताबिक टास्क फोर्स कायम करना मददगार हो सकता है। प्रधानमंत्री ने यह जिम्मा गृह मंत्री पी चिदंबरम को सौंपा है। उसके बेहतर नतीजे हो सकते हैं, लेकिन यहां यह प्रश्न भी फिलहाल अनुत्तरित है कि ऐसे में राज्य सरकार कहां सोई पड़ी है? घाटी में देखी जाती रही हिंसा-प्रतिहिंसा पर काबू पाने में उसकी कोई भूमिका नहीं है? कोई पत्थर से न मारे मेरे दीवाने को- यह सोच दोनों तरफ लागू होती है। घाटी की आहत जनता के घावों पर मरहम लगाने के लिए राज्य में विकास को अधिक बढ़ावा देने के साथ-साथ युवा पीढ़ी को रोजगार मुहैया करने तथा उन्हें भटकाव से बचाने की आज सबसे ज्यादा जरूरत है। आंतरिक व बाहरी सुरक्षा के मोर्चे पर भी उतना ही सजग होना जरूरी है।

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