भारतीय चरित्र का विश्लेषण

हम जल्दी ही बहकावे में आ जाते हैं और हमारी यह मानसिकता सदियों से ही ऐसी है…

यदि आपने सुधीर कक्कड़ द्वारा किया गया भारतीय चरित्र विश्लेषण नहीं पढ़ा, तो समझिए आपसे कुछ बहुत मूल्यवान चीज छूट गई है। मैंने उनकी सभी किताबें पढ़ी हैं और अगली किताब की प्रतीक्षा में रहता हूं। वह भारत के सबसे अधिक प्रसिद्ध मनोविशेषज्ञ हैं। साथ ही एक सुंंदर व्यक्ति भी हैं, जिनके आकर्षण में अनेक सुंदर महिलाएं गिरफ्तार होती रही हैं। वह अब गोवा में अपनी दूसरी पत्नी के साथ रहते हैं, जो कि एक जर्मन मनोचिकित्सक हैं।

आप उनकी हाल ही की किताब ‘दि क्रिमसन थ्रोन’ (पेंग्विन वाइकिन) से शुरुआत कर सकते हैं, जो मैं समझता हूं कि उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति है। इसमें उन्होंने काफी विषयों को उठाया है। यह पुस्तक बादशाह शाहजहां के शासन के अंतिम वर्ष और उनके चार बेटों के बीच उत्तराधिकार की लड़ाई पर आधारित है। इसका आधार दो यूरोपियन यायावरों का नजरिया भी है। इतालवी निकोलाइस मानुसी जो कि वेनिस का एक युवा अर्धशिक्षित व्यक्ति है, जिसकी औरतों के प्रति भूख कभी शांत नहीं होती। वह एक डेक क्लीनर के रूप में काम करता था और सन् 1675 में गोवा आया। उसने स्टोरिया रूमागर में अपने अनुभव लिखे हैं। दूसरा एक फ्रांसीसी फ्रेंकोइस बरनियर था, जो उससे ज्यादा तेज था और सूरत आया था और जिसने मुगल शासन के हालात के बारे में लिखा था। कक्कड़ ने अपनी रचना का आधार पूरी तरह से इन दूसरे स्रोतों को बनाया है और यह कि उसने 17वीं शताब्दी में भारत के बारे में जो कुछ भी कहा था, वह आज के भारत के बारे में भी सच है। आपकी जिज्ञासा शांत करने के लिए मैं आपको बतलाता हूं कि किस तरह यह मानुसी गोवा से दिल्ली आया और एक मैजिक हीलर के रूप में यानी कि जादुई इलाज करने वाले के रूप में प्रसिद्ध हुआ। यहूदी पादरियों ने उसका आदर सत्कार किया, जो उन्हें एक पहाड़ की चोटी पर मिला। उसका एकमात्र साथी एक हिंदू वैद्य था। उसने उसे बताया कि पेट ही सभी बीमारियों की जड़ है और बीमार व्यक्ति का मल परीक्षण करना जैसे कि उसका रंग, बनावट, बू की जांच पड़ताल करना कोई भी दवा दिए जाने से पहले अनिवार्य है। मानुसी यह ज्ञान लेकर दिल्ली आया। उसने सैकड़ों बैलगाडि़यों के कारवां में सफर किया। प्रत्येक 29 मील पर एक सराय थी। किलेबंदी में सुरक्षा, खाना और आरामदेह चारपाई और अलग से पैसे देने पर औरतें भी मिल जाती थीं। इस तरह वह राजधानी आया और यह बात फैल गईर् कि मानुसी एक महान डाक्टर है। जल्द ही उसे महल से एक जवान बेगम का उपचार करने के लिए बुलाया गया, जो कि बेहोश थी। उसने पाया कि वह चार दिन से ज्यादा नहीं जिएगी। उसने हुक्के की नली से एक एनीमिया यंत्र बनाया और उसके जरिए गुदा में आयुर्वेद दवाई पहुंचाई। उस औरत के मसाने खुल गए और उसकी बेहोशी दूर हो गई, वह बैठ गई और बातें करने लगी। मानुसी फिरंगी चमत्कारी डाक्टर के रूप में प्रसिद्ध हो गया।

गुमनाम विद्वान

दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में नवीनतम पुस्तक का विमोचन बहुत ही सफल रहा। आडिटोरियम और गैलरी पूरी तरह भरी थी और बहुत से लोगों को वापस जाना पड़ा। यह सब ज्यादातर ‘दि शॉप’ के मालिक परमिंदर सिंह की इवेंट मैनेजमेंट काबिलीयत की वजह से और उन लेखकों की वजह से हुआ, जिनके लेखों का संपादन और संग्रह माला दयाल ने सेलिब्रेटिंग दिल्ली (रवि दयाल तथा पेंग्विग वाइकिन) को तैयार करने में किया था। प्रधानमंत्री की बेटी और प्रमुख योगदानकर्ता उपिंद्र सिंह ने समारोह की अध्यक्षता की। वह अपने पिता से अच्छी वक्ता हैं। उनकी मां गुरशरण कौर भी अचानक आ गईं और सबका ध्यान खींच लिया। पुस्तक की सभी प्रतियां बिक गईं। लेखकों में विलियम, डायरिंपल (1857 का गदर), सुमीत कुमार (सूफी मजार), नारायणी गुप्ता (दिल्ली के स्थल और नाम), विद्या राव (दिल्ली घराना) सोहेब हाशमी (दिल्ली की बोलियां) दुन्नु राय (भवन निर्माता), प्रीति नारायण (दिल्ली का खानपान) रवि दयाल (कायस्थ हेरिटेज)थे। तो मेरे लिए किताब लेने के बजाय मेरी बेटी ने प्रदीप किशन का मध्य भारत के जंगली पेड़ नामक मुफ्त का ब्रोशर उठा लिया। इसे देखकर मुझे तब लगा कि प्रदीप ने हमारे देश के वनों के बारे में जानकारी फैलाने के लिए जो कुछ किया है, उसका उसे श्रेय नहीं मिला है, जो काम सालिम अली ने उपमहाद्वीप के पक्षियों के बारे में जानकारी देकर किया है। प्रदीप ने वही काम पेड़ों के बारे में जानकारी देकर किया है। सालिम बहुत ज्यादा पुरस्कृत किए गए और राज्य सभा के लिए नामिनेट भी हुए। प्रदीप को अब तक केवल उन लोगों की प्रशंसा और आदर ही मिल पाया है, जो पेड़ों के बारे और अधिक जानना चाहते हैं, जिन्हें वह प्रतिदिन देखते हैं। क्यों? मुझे कारण मालूम है अरुंधति राय को तो सब जानते हैं और प्रदीप को केवल उसके पति के रूप में तो उसका कारण यह है कि वह एक सुंदर लड़की है, जिसने एक पहले दर्जे का उपन्यास ‘दि गॉड आफ स्माल थिंग’ लिखा, जिस पर बुकर पुरस्कार मिला, जबकि प्रदीप नक्सलाइट-माओवादी समस्या को हल करने के बारे में सरकार की नीतियों की खुलेआम आलोचना करते रहे।  अरुंधति की गिनती विश्व की सबसे ज्यादा प्रभावशाली महिलाओं में हुई, जबकि प्रदीप शर्मीले, अपने में ही डूबे रहने वाले व्यक्ति हैं, जिन्हें प्रचार से परहेज है। वह फिल्म प्रोड्यूसर बनना चाहते थे। मैंने उनके माता-पिता के घर पर उनकी बनाई ‘मैसी साहब’ देखी थी। (मैं उन्हें अपने कालेज के दिनों से जानता था।) मुझे लगा कि यह एक शानदार फिल्म है, जिसमें अरुंधति ने प्रमुख भूमिका अदा की थी और उस कबाड़ से तो बहुत बेहतर है, जो बालीवुड हर रोज पेश करता रहता है, जिसका मकसद बाक्स आफिस पर पैसा कमाना ही होता है। प्रदीप ने फिल्म बनाना छोड़ दिया और प्रकृति की ओर मुड़ गए। सबसे पहले लोदी गार्डन के पेड़ों के बारे में एक छोटी सी पुस्तिका आई, क्योंकि मैं वहां रोजाना घूमने जाता था, मैंने इसे खरीद लिया और पाया कि इस विषय पर लिखते हुए मैंने कई बार गलतियां की हैं।  उसके बाद आई ‘ट्रीज आफ दिल्ली’, जो कि बढि़या क्वालिटी, सुुंदर तस्वीरों से सजी एक विद्वतापूर्ण श्रेष्ठ पुस्तक है, जिससे पेड़ों की पहचान करना आसान हो जाता है। इसमें तने, टहनियों, पत्ते, फल के बारे में तथा दवाइयों और उद्योग द्वारा उनके इस्तेमाल का विस्तारपूर्वक वर्णन है। मुझे इस विषय पर कोई भी दूसरी किताब इतनी सटीक नहीं लगी। क्या यह वक्त नहीं है कि राज्य, केंद्रीय सरकार और अकादमियां इस व्यक्ति की पहचान करें। यदि हम अब तक उन्हें अरुंधति के पति के रूप में जानते रहे हैं, तो हमें उन्हें भी प्रदीप किशन की पत्नी के रूप में जानना चाहिए।

चीनी पहेली

श्री और श्रीमती हुआ नाम के एक चीनी दंपति, जिनकी असल में शादी नहीं हुई थी, उनके जुड़वां संतान हुई। उन्होंने उनके नाम रखे जो हुआ, सो हुआ।

(जेपी काका ने भोपाल से भेजा)

खुशवंत सिंह लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं

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