मंडी को चाहिए गेयटी जैसा थियेटर

यह मसला किसी टाउन हाल के हस्तांतरण का नहीं है, बल्कि यह वह पैमाना है जहां हिमाचली सृजन के सारे पहलू फट जाते हैं। मंडी स्थित टाउन हाल किसकी बपौती है और अगर कला के प्रति यही दस्तूर है, तो हिमाचल में सांस्कृतिक उत्सव मनाने से कोई उद्देश्य पूरा नहीं होता। दरअसल मंडी के टाउन हाल को कला केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना भाषा-संस्कृति बना रहा है, लेकिन बेडि़यों में जकड़े भवन को आजादी नहीं मिल रही। हमारा मानना है कि मंडी को सांस्कृतिक राजधानी का दर्जा देने के लिए आवश्यक अधोसंरचना की जरूरत निरंतर रही है। ऐसे में गेयटी थियेटर की तर्ज पर टाउन हाल या किसी अन्य भवन का निर्माण होता है, तो यह हिमाचली कलाकारों के प्रति राज्य की अनुपम भेंट होगी। जाहिर तौर पर गेयटी थियेटर के नए रंग रूप में एक नए रंगमंच का
आगाज भी हुआ है। आज प्रदेशभर में लोक कलाकारों के जत्थे अपनी प्रतिभा का नया आकाश खोज रहे हैं, लेकिन यह अकेले गेयटी थियेटर से संभव नहीं। प्रदेश में भले ही सांस्कृतिक समारोहों में बढ़ोतरी हुई है, लेकिन लोक रंगमंच के स्थायी स्तंभ स्थापित नहीं हुए। यही वजह है कि आज तक हिमाचली रंगमंच के तौर पर यहां की सांस्कृतिक उजास को पहचान नहीं मिली। हैरानी यह है कि मिंजर, शिवरात्रि, लवी या कुल्लू के दशहरा समारोह खुद को हिमाचली मंच के रूप में स्थापित नहीं कर पाए और न ही पर्यटकों के लिए हम ऐसे थियेटर बना पाए, जहां प्रदेश की सांस्कृतिक विविधता के दर्शन हो पाते। केवल एक गेयटी थियेटर के  सिंहासन पर हिमाचली कलाओं व कलाकारों को प्रतिष्ठित नहीं किया जा सकता। प्रदेश सरकार को इस दिशा में विशेष प्रयास करने होंगे, अन्यथा मंडी जैसे शहर की सांस्कृतिक विरासत को कब तक सहेज पाएंगे। प्रदेश के पर्यटन व जिला मुख्यालयों में आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित सभागार बनाए जाएं, ताकि लोक कलाकारों को स्थायी मंच मिले। पूर्वोत्तर के अलावा अन्य सभी राज्यों में हर महत्त्वपूर्ण पर्यटक डेस्टीनेशन में ऐसे थियेटर की वजह से रंगमंच का बखूबी विस्तार हुआ है। पूर्व पर्यटन मंत्री जीएस बाली ने लोक कलाकार को पर्यटन के साथ जोड़कर एक बेहतरीन पहल की थी, लेकिन इस दिशा में आगे नहीं बढ़ा गया। कोई भी सैलानी मनाली, मकलोडगंज, डलहौजी या अन्य पर्यटक स्थलों पर आकर नृत्य-नाटिका, लोकगीत-संगीत या सांस्कृतिक प्रस्तुतियां देखना चाहता है, लेकिन इसके बदले उसे क्या मिलता है। प्रदेश में पर्यटन, भाषा-संस्कृति, नगर निकाय व हिमुडा को मिलकर सभागारों की एक शृंखला बनानी चाहिए ताकि मनोरंजन के नजरिए से हिमाचली रंगमंच को ख्याति मिले। इस दिशा में सांसद अनुराग ठाकुर ने मंडी में कला केंद्र का सपना देखा था, लेकिन इसे यथार्थ में बदलने के प्रयत्न नहीं हुए। इतना ही नहीं हिमाचल अगर गरली-परागपुर के धरोहर महत्त्व को पहचाने, तो वहां फिल्म सिटी व फिल्म संस्थान की स्थापना करके लोक कलाकारों की नई जमात तैयार की जा सकती है।

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