मौत के काफिले

परिवहन जब मौत का दस्तावेज बनता है, तो हिमाचल की सड़कें मरघट का खौफ बन जाती हैं। यही मनहूस पल मंडी के अभागे ट्रक को मानवीय भूल का दैत्य बना देते हैं। वहां मौत ट्रक पर घूम रही थी और उसने अपना विकराल चेहरा फिर दिखा दिया, लेकिन हमारे लिए यह एक दुर्घटना है। ठीक वैसे ही जब 13 साल पहले हमीरपुर में ट्रक गिरा था। धर्मशाला के कुनाल पत्थरी मंदिर से लुढ़के ट्रक ने लाशों का अंबार लगा दिया था,अब मंडी का हादसा हमारी लापरवाही का सबूत बनकर कई प्रश्न खड़े कर रहा है। यह किसी पारिवारिक समारोह का विनाशकारी मंजर तो था, लेकिन ट्रक में सवारियां ढोने की अनुमति किसने दी। यह केवल एक उदाहरण नहीं, हिमाचल के हर देवस्थल पर मन्नतें ढोते ट्रकों में ऐसे खतरे सवार हैं। हैरानी यह कि बरसात के मौसम में धार्मिक यात्राओं के सिलसिले कानून-व्यवस्था को पूरी तरह नजरअंदाज कर देते हैं। बेशक आर्थिक दृष्टि से परिवहन का यह तरीका सस्ता है, लेकिन इसे मौन स्वीकृति देकर प्रदेश किसका भला कर रहा है। मौत के इन रेंगते प्रश्नों पर खामोशी क्यों? प्रदेश के प्रवेश द्वारों को लांघते ऐसे वाहनों की खबर क्यों  नहीं, जो परिवहन शब्दावली की घोर निंदा व मानव जीवन से अन्याय है। हर साल हजारों ट्रक व ट्रैक्टर यातायात नियमों का उल्लंघन करके प्रदेश में धार्मिक पर्यटन को प्रमाणित करते हैं, लेकिन असुरक्षित परिवहन के ऐसे काफिलों पर कोई पाबंदी नहीं। हैरानी यह भी कि यातायात नियमों पर सामान्य नागरिक की खटिया खड़ी कर देने वाली यातायात पुलिस को यह सब नजर क्यों नहीं आता। क्यों नहीं परिवहन के नियम कारगर सिद्ध होते। प्रदेश में यातायात के नजरिए से वाहनों के मानक हमेशा सख्त होने चाहिए, ताकि सड़कों की हालत व दबाव के अनुसार परिवहन व्यवस्था बनी रहे। विडंबना यह है कि प्रदेश में वाहनों का दबाव तो बढ़ रहा है, लेकिन इसके अनुरूप न तो सड़क मार्ग तैयार हैं और न ही परिवहन संचालन माकूल हैं। मंडी के बाद शिमला में बस दुर्घटना के कारण काफी हद तक परिवहन व्यवस्था के जोखिम बता रहे हैं। ऐसे में सुरक्षित परिवहन के आधार पर सड़क मार्गों का विस्तार व देखभाल जहां आवश्यक है, वहीं वाहनों के सही इस्तेमाल का नियमन भी होना चाहिए। प्रदेश में सड़क मार्गों की स्थिति के अनुरूप ऐसी रणनीति नहीं बनी, जो वाहनों के आकार-प्रकार तय करती। सड़क दुर्घटनाओं के दृष्टिगत कोई सर्वेक्षण नहीं हुआ, ताकि भविष्य में परिवहन सुरक्षित होता। प्रदेश में सड़क दुर्घटनाएं इसलिए भी बढ़ रही हैं, क्योंकि परिवहन नीति के तहत प्रदेश की समूची व्यवस्था को नहीं समझ पाए हैं। परिवहन के विकल्प जब तक तैयार नहीं होते सड़कों पर मौत का साया रहेगा। ऐसे में एरियल परिवहन के अलावा रेलवे विस्तार का खाका मजबूत करना पड़ेगा। प्रदेश की सड़कों को परिवहन योजना के तहत नया लुक देने की जरूरत है, जबकि स्थानीय परिवहन की जरूरतों को समझना होगा। प्रदेश में धार्मिक यात्राओं के दौरान परिवहन दबाव को देखते हुए यातायात की उचित व्यवस्था हम नहीं कर पाए हैं। आनंदपुर साहिब-नयनादेवी रोप-वे को अतिशीघ्र शुरू करने के साथ-साथ तमाम मंदिर नगरियों को इसी तरह एरियल परिवहन व्यवस्था से जोड़ने की त्वरित योजना बनानी होगी।

You might also like