लेह में विनाश के बाद

लेह में बादल फटने के कारण मची तबाही के बाद भी अभी यह तय नहीं है कि इस आपदा ने कितने लोगों की जान ली और कितने अभी तक मलबे में फंसे हैं। अब तक जहां 170 शवों को बरामद किया जा चुका है, वहीं 600 से अधिक लोगों के मारे जाने की आशंका व्यक्त  की गई है।  कई गांव
तबाह हुए हैं, जबकि बेघर हुए लोगों की हालत शरणार्थियों जैसी हुई है। लेह में बादल फटने तथा अति वर्षा के कारण
जो कुछ हुआ, वह त्रासदीपूर्ण तो है ही, प्रकृति के रौद्र रूप का भी परिचायक है। लेह के लोगों ने कभी कल्पना भी नहीं
की होगी कि उन पर इस कद्र बड़ी आफत टूट पड़ेगी। लापता लोगों में 200 से अधिक प्रवासी मजदूरों का शामिल होना
इस हादसे का एक और दुखद पहलू है। वैसे तो हिमाचल और उत्तराखंड भी समय-समय पर ऐसी त्रासदियां झेल चुका
है, पर लेह में जो कहर बरसा, वह कम भयावह नहीं है। यहां इस बात की तारीफ की जानी चाहिए कि स्थानीय
प्रशासन, भारतीय वायुसेना, भारतीय सेना तथा दूसरे सुरक्षा बल राहत एवं बचाव कार्यों में जुटे हैं। यह एक ऐसी त्रासदी है, जिसे देखते हुए पड़ोसी राज्यों विशेषकर साथ लगते हिमाचल को भी मदद कार्यों में आगे आना चाहिए।  हिमाचल के संपर्क मार्ग भी इस कारण प्रभावित हुए हैं। अभी जबकि लेह में जान-माल को हुए नुकसान का सही अंदाजा लगने में वक्त लगेगा। यह मौका प्रभावित क्षेत्रों में राहत एवं पुनर्वास कार्यों को बढ़ावा देने के साथ-साथ चिकित्सा सुविधा उपलब्ध करवाने का भी है। लेह को अपने पुराने स्वरूप में लौटते हुए अभी समय लगेगा, लेकिन इस बीच प्रभावित क्षेत्रों को हर तरह की मदद पहुंचाने में कोई कोताही नहीं बरती जानी चाहिए। उतना ही जरूरी काम प्रभावित इलाकों में फंसे लोगों को सुरक्षित जगहों तक पहुंचाने तथा वहां पर्याप्त मात्रा में खाद्य सामग्री मुहैया करवाने का भी है। इस काम में केंद्र को भी उदार सहायता देने की पहल करनी चाहिए। लेह में बादल फटने तथा कुछ जगहों पर भारी बाढ़ के कारण कुछ भी क्यों न रहे हों, इसके पीछे पर्यावरण से होती रही छेड़छाड़ तथा वायुमंडल में होते रहे आकस्मिक परिवर्तन भी जिम्मेदार रहे हैं। मनुष्य इस ओर न जाने कब चौकस होगा। पर्यावरण विशेषज्ञ मनुष्य को इस तरह के खतरों के प्रति सावधान होने तथा ग्लोबल वार्मिंग के कारण धरती के लिए पैदा हो रहे संकट से अवगत करवाते रहे हैं, लेकिन उसके वांछित परिणाम देखने में नहीं आ सके हैं। कभी पर्वतीय पर्यटन व बौद्ध संस्कृति का अनुपम केंद्र समझा जाने वाला लेह-लद्दाख का इलाका विश्व भर की उत्सुकता का विषय बना रहा है। बादल फटने व अति वर्षा के कारण लद्दाख के इलाके में हुई भारी तबाही का मंजर
मनुष्य को एक बार फिर प्राकृतिक संतुलन तथा पर्यावरण से होती रही छेड़छाड़ के प्रति सावधान कर गया है। यह
तबाही जम्मू-कश्मीर के लिए ही नहीं, पूरे देश के लिए अफसोसनाक है। जरूरत इस बात की है कि इस चुनौती से निपटने के साथ-साथ भविष्य के लिए ऐसी रूपरेखा तय की जाए, ताकि इस तरह की त्रासदियां हजारों जिंदगियों और मूल्यवान संपदा को लील न पाएं। उन पर पूरी तरह काबू न भी पाया जा सके, एहतियाती कदम उठाकर उसकी मारक क्षमता कम की जा सकती है।

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