विधायक और सांसद भी सार्वजनिक/जन सेवक हैं

आम जनता के लिए कानून हैं कि सरकारी काम में रुकावट या अवरोध करने पर उसे कड़ी सजा हो सकती है, तो ऐसा प्रावधान सांसदों के लिए भी क्यों न हो…

हमारे देश का गणतंत्र भी अजीब है। ऐसा यहां ही हो सकता है कि कोई स्वयं ही अपना वेतन व भत्ते तय करे या उन्हें जब इच्छा हो तो बढ़ा ले। हमारे चुने हुए प्रतिनिधि, सांसद या विधायक कुछ ऐसा ही कर सकते हैं। सरकार विधेयक सदन में पेश करती है और सभी पक्ष व विपक्ष के सांसद या विधायक वेतन और भत्तों को अधिक से अधिक करवाकर पारित करवाने में एकजुट हो जाते हैं। किसी अच्छे या जन कल्याण के विधेयक या चर्चा में सभी पार्टियां एकमत हों या न परंतु वेतन वृद्धि के लिए तो कोई असहमति नहीं जताते। इनकी वेतन वृद्धि के लिए न कोई आयोग है न कमेटी और न ही कोई अवधि। वेतन व भत्ते एक-दो या कभी भी संशोधित हो सकते हैं न कि सरकारी कर्मचारियों की तरह दस वर्ष। अभी-अभी केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सांसदों का वेतन 16000 रुपए से बढ़ाकर 50000 रुपए प्रतिमाह करने का प्रस्ताव पारित किया है। इसके अतिरिक्त चुनाव क्षेत्र भत्ता (40000 रुपए), सांसद दफ्तर भत्ता (40000 रुपए) होगा। चार लाख रुपए का कार ऋण ब्याज मुक्त तथा कार में यात्रा करने पर 16 रुपए प्रति किलोमीटर मिलेगा, जो शायद हवाई यात्रा के किराए से भी अधिक पड़ेगा। हर सप्ताह सत्र के दौरान सांसद अपने चुनाव क्षेत्र जा सकते हैं, जिसके लिए सभी भत्तों का प्रावधान है। यह सब कम है, सांसद की पत्नी या पति उच्चतम श्रेणी में कितना भी सफर कर सकते हैं। दिल्ली में बढि़या कोठियां भी इनके लिए उपलब्ध हैं। ऊपर लिखित वेतन व भत्तों का प्रस्ताव श्री लालू व अन्य सांसदों को बहुत कम लगा और इसी कारण संसद की कार्यवाही दो दिन तक अवरुद्ध रही। अब सरकार उनकी दलील व मत को ध्यान में रखेगी और शायद वेतन व भत्तों में और बढ़ोतरी दी जाएगी। ये वही लोग हैं जो करोड़पति हैं न कि करोड़ों देशवासी जो प्रतिदिन 20 से 30 रुपए में निर्वाह करते हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार 350 से अधिक वर्तमान सांसद करोड़पति हैं। सांसद यह दलील देते हैं कि वे भी सार्वजनिक सेवक/जन सेवक हैं, जैसे कि सरकारी कर्मचारी/सरकारी कर्मचारी अपने कार्यालय से गैर हाजिर नहीं हो सकता।

यदि एक दिन भी गैर हाजिर हो जाए, तो अपना पद गवां सकता है परंतु लोकसभा या राज्यसभा की कार्यवाही को देखें, तो लगभग हमेशा ही आधे से अधिक सांसदों के आसन खाली पाए जाते हैं। यदि सांसद इतने अधिक वेतन और भत्ते पा रहे हैं तो उनकी उपस्थिति भी अनिवार्य क्यों न हो। इसी प्रकार उन्हें सदन की कार्यवाही अवरुद्ध करने का हक हासिल है। आम जनता के लिए कानून हैं कि सरकारी काम में रुकावट या अवरोध करने पर उसे कड़ी सजा हो सकती है, तो ऐसा प्रावधान सांसदों के लिए भी क्यों न हो। यदि वे सार्वजनिक सेवक हैं। कार्यवाही अवरुद्ध किए दिनों का वेतन व भत्ते भी सांसदों को क्यों मिलें क्योंकि ‘काम नहीं तो वेतन नहीं’ वाला नियम उनके लिए भी लागू होना चाहिए। संसद सब प्रकार के कानून बनाती है, तो हमारे संसदीय कार्य मंत्री ऐसा विधेयक क्यों नहीं लाते कि दोनों त्रुटियों का समाधान हो। संसद सत्रों के पहले या पश्चात सांसदों की क्या कारगुजारी रहती है उसका भी ब्यौरा आवश्यक है। घर बेकार बैठे वेतन व भत्ते प्राप्त करना जुर्म है और जनता से धोखा। संसद सत्र के दौरान सांसदों को चर्चा में भाग लेने व अपना मत रखने का हक है व कर्त्तव्य है, परंतु गौर करें तो हम जानेंगे कि अधिकतर सांसद पांच वर्ष की अवधि में कभी बोल ही नहीं पाते। उनमें काबिलीयत भी चाहिए कि मुद्दों को अच्छी तरह समझ पाएं और कुछ विचार रखें। वे तो प्रतीक्षा करते रहते हैं कि उनका राजनीतिक पार्टी की तरफ से कब हाथ उठाने का निर्देश आए, ताकि उनका काम पूरा हो। क्योंकि ऐेसे सांसदों को कभी-कभार संसद में बैठ चुपचाप तमाशा देखने के लिए ही डेढ़-दो लाख रुपए प्रतिमाह देश के खजाने से खर्च हो रहे हैं।

यह शायद इसलिए भी है कि विभिन्न पार्टियां टिकट आबंटित करते समय प्रत्याशी की दौलत व गुंडागर्दी का ध्यान रखती हैं। हमारे सांसद करोड़पति तो हैं ही, परंतु 150 से अधिक गुनाहों के दोषी हैं या उन पर मुकदमें चल रहे हैं। कोई भी घोटाला हो जाए संसद में मांग उठती है कि संयुक्त संसदीय कमेटी जांच करेगी। क्या सांसद तहकीकात करने के विशेषज्ञ हैं? या एक-दो वर्ष मौज-मस्ती पाने के लिए लालायित रहते हैं। संसद में प्रश्न पूछकर पैसे बनाने का प्रकरण पहले ही उजागर हो चुका है। हम भारतीयों का आटे में नमक ढूंढने का प्रयत्न रहता है, पता नहीं देश कहां जाएगा। देश की आम जनता धीरे-धीरे जागरूक हो रही है। एक क्रांति आने पर सब धांधली ठीक होगी, तब तक के लिए हम बेबस मूकदर्शक ही रहेंगे।

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