विशेषज्ञ चिकित्सकों का इंतजार

रमन कुमार गुप्ता, सुंदरनगर

हिमाचल प्रदेश मंत्रिमंडल की नौ अगस्त की बैठक में स्वास्थ्य नेटवर्क को सशक्त करने के लिए स्वास्थ्य संस्थानों में नियमित आधार पर 150 और अनुबंध आधार पर 63 चिकित्सकों की नियुक्ति से प्रदेश के कई अस्पतालों में चिकित्सीय दक्षता की उम्मीद जगेगी। वर्तमान में स्वास्थ्य विभाग के लक्ष्य विभागीय कसौटियों के आगे कमजोर पड़ रहे हैं। ऐसे कई चिकित्सालय हैं, जहां आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध होेेने के बावजूद स्वास्थ्य विभाग अपनी उपयोगिता को साबित नहीं कर पा रहा है। ऐसे संस्थान तो मरीजों को आगे रैफर करके अपनी जिम्मेदारी को आगे सरका देते हैं। एक मोटे अनुमान के अनुसार सबसे अधिक पथरी के मरीज बाहरी प्रदेशों का रुख करते हैं, क्योंकि उपमंडल तथा जिला मुख्यालयों पर स्थित अस्पताल पूरी तरह सक्षम नहीं हैं, विशेषज्ञ डाक्टरों का भारी टोटा चल रहा है। स्पष्ट है, जब जिला स्तर पर विशेषज्ञ डाक्टर नहीं होंगे, तो मरीज कहां जाएंगे। शिमला, चंडीगढ़ या जालंधर। पथरी की शल्य चिकित्सा का कुल व्यय दिल्ली, चंडीगढ़ की तुलना में जालंधर के जम्मू अस्पताल में कम बैठता है। आज समय और परिस्थितियों की मांग है, इस इतिहास को बदलने की। यदि प्रदेश के मंडी, चंबा और नाहन आदि चंद जिला मुख्यालयों के चिकित्सालयों को पूरी तरह अग्रणी संस्थान बनाया जाए, तो मरीज बाहर जाने के बजाय प्रदेश के भीतर बेहतर सुविधाएं पा सकते हैं। यही नहीं सुंदरनगर जैसे चंद क्षेत्रीय अस्पतालों को पूरी तरह सक्षम करके और किसी एक रोग विशेष के राज्य अस्पताल का दर्जा दिया जाए, तो अनेक सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल बन जाएंगे। इससे आईजीएमसी तथा टीएमसी मंे मरीजों का दबाव भी कम होगा, मरीजों और उनके संरक्षकों के समय और धन की बचत होगी तथा तरह-तरह की परेशानियों से भी निजात मिल सकेगी। क्या कामना की जाए कि राजनीतिक व्यवस्था इन चिकित्सीय समस्याओं को दूर कर पाएगी।

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