समाधान नहीं है स्वायत्तता!

कश्मीर  की स्वायत्तता एक बार फिर मुद्दा बनी है। प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने सर्वदलीय बैठक में कश्मीर की स्वायत्तता का जिस तरह आश्वासन दिया है, उसके आशय क्या हैं, यह राजनीतिक दल ही नहीं, देश की अखंडता के समर्थक भी जानना चाहेंगे। स्वायत्तता का अर्थ क्या यह है कि कश्मीर को ‘खुदमुख्तार’ घोषित कर दिया जाए? भारत की केंद्र सरकार और संविधान से उसका कोई नाता न रहे? कश्मीर को एक आजाद मुल्क का दर्जा दे दिया जाए? क्या प्रधानमंत्री सुलगते-उबलते कश्मीर का समाधान स्वायत्तता में ही तलाश रहे हैं? जिन युवाओं के भीतर एक अजीब सा गुस्सा दहक रहा है और जिनके हाथ सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंक रहे हैं, क्या उनका बुनियादी सरोकार स्वायत्तता ही है? कश्मीर हमेशा ऐतिहासिक और प्राकृतिक तौर पर भारत का ही एक हिस्सा रहा है। कश्मीर की पीड़ा और उसका गुस्सा हमेशा भारत को चिंतित करते रहे हैं। कश्मीर हमारी अंतरराष्ट्रीय रणनीति का अग्रिम मोर्चा भी है। कश्मीर ने हमारे संवैधानिक मूल्यों में आस्था और निष्ठा जताई है। केंद्र ने पहाड़ों की कंदराओं को चीरकर रेलगाड़ी की सुविधाएं भी बिछाई हैं। कश्मीर को अनेक आर्थिक पैकेज भी मुहैया कराए गए हैं। लोकतांत्रिक जनादेश की भी कश्मीर को पूरी संवैधानिक स्वतंत्रता दी गई है। कश्मीर से ही फारुख अब्दुल्ला, गुलाम नबी आजाद मौजूदा केंद्रीय कैबिनेट के हिस्से हैं और सैफुद्दीन सोज भी इस हैसियत को भोग चुके हैं। मुफ्ती मोहम्मद सईद तो भारत के गृहमंत्री रह चुके हैं। इसके बावजूद प्रधानमंत्री और किस राजनीतिक पैकेज की बात कर रहे हैं? क्या फुटकर जुमलेबाजों के बीच रेवडि़यों की तरह सियासत बांट देनी चाहिए? दरअसल कश्मीर को क्या चाहिए, बुनियादी मुद्दा यह है। अलगाववादियों के ‘आजादी’ वाले जुमले को तो एकदम नकार देना चाहिए। स्वायत्तता की संपूर्ण व्यवस्था होनी चाहिए। कश्मीर की पीड़ा और पत्थर फेंक प्रतिक्रिया का एहसास होना चाहिए कि दरअसल कुछ नीतिगत गलत हुआ है, जिससे कश्मीर शांत नहीं हो पा रहा है। सेना और सुरक्षा बलों को लेकर कश्मीरियों में गहरी नाराजगी है। हमारा मानना है कि यदि दिल्ली और श्रीनगर की सरकारों ने सुरक्षा बलों के स्तर पर हुई क्रूरताओं को कबूल किया होता और उनमें संशोधन किए होते, तो शायद यह नाराजगी पिघलना शुरू कर देती। कश्मीरी युवाओं ने सेना को ‘हमलावर’ के तौर पर ग्रहण किया और सरकारों को सेना की तैनाती घोर अनिवार्य लगती रही। नतीजतन इस विरोधाभास ने भी कश्मीर को सुलगाए रखा है। कश्मीर आतंकियों की घुसपैठ से मुक्त नहीं हो पाया है, लिहाजा सेना की मौजूदगी तो अभी अपरिहार्य है। इस हकीकत को कश्मीर के स्थानीय राजनीतिक दलों के जरिए अवाम के भीतर उतारा जाना चाहिए। तब तक जिस तरह आर्थिक-राजनीतिक पैकेज नाकाम रहे हैं, उसी तरह स्वायत्तता भी फिजूल साबित होगी। कश्मीर में ‘ग्रास रूट’ तक बहुत कुछ बदलने की जरूरत है। प्रधानमंत्री के बयान और रोजगार के लिए विशेषज्ञ समूह बनाने से ही समाधान हासिल नहीं हो सकते। गुस्सा और आक्रोश कई स्तरों पर है। मानवाधिकारों और सच्चे लोकतंत्र के मद्देनजर भी कश्मीरी युवा तमतमा रहा है। कमोबेश उसे आगे सुख-दुख बयां करने की तो आजादी हो। प्रधानमंत्री के आश्वासनों में कहीं भी एक मुकम्मल तस्वीर नहीं है। ढेरों सवाल और संदेह हैं। स्वायत्तता का मुद्दा कई बार उठा है, लेकिन आज तक स्पष्ट नहीं है कि जम्मू और लद्दाख भी स्वायत्तता की परिधि में आएंगे या यह सिर्फ घाटी तक ही सीमित होगी? बेघर हुए लाखों कश्मीरी हिंदुओं की उस स्वायत्तता में क्या जगह होगी, आज तक स्वायत्तता ने किसी भी तरह आश्वस्त नहीं किया। बहरहाल राजनीतिक स्तर पर संवाद करें, बैठकें करें, मनुहार करें, पैकेज तैयार करें, लेकिन कश्मीर को एक प्यार भरी पुचकार भावुक मरहम और ठोस आश्वासन की बहुत जरूरत है। उसमें स्वायत्तता के जुमले बेमानी हैं।

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