सांसद या कारपोरेट कर्मचारी!

अंततः कैबिनेट ने सांसदों का वेतन और भत्ते करीब 300 फीसदी बढ़ाने का प्रस्ताव स्वीकृत कर ही लिया। चेहरों से जनवादी मुखौटा एकदम उतर गया, क्योंकि महंगाई, बाढ़ और अन्य संकटों के कारण बीते सप्ताह कैबिनेट ने इस प्रस्ताव को टाल दिया था। सब कुछ पूर्व नियोजित लगता है। एक सप्ताह के भीतर न तो महंगाई लुढ़की और न ही बेचारे सांसद इतने फकीर हो गए कि उनके वेतन और भत्तों की माहवार राशि करीब 3.50 लाख रुपए करने का फैसला किया गया। सरोकार और सवाल एक औसत सांसद के सम्मान और दर्जे का नहीं है। सांसद तब भी भारत सरकार के सचिव दर्जे के नौकरशाहों से ऊपर था, जब उसका बुनियादी वेतन 5000 रुपए से भी कम था और अब भी 50,000 रुपए के प्रस्तावित वेतन के साथ उसके संसदीय स्थान में कोई परिवर्तन नहीं आएगा। तो वेतन के साथ सांसद का स्तर कब से जुड़ा, इसकी व्याख्या होनी चाहिए और वेतन  बढ़ोतरी के मानदंडों की परिभाषा तय होनी चाहिए। क्या अब हमारे सांसदों की पहचान सिर्फ पैसा है? जिस देश की आधी आबादी बेहद गरीब और भूखी है, उसके निर्वाचित प्रतिनिधि लखपति कैसे हो सकते हैं? सांसद जनसेवक हैं या कारपोरेट कर्मचारी अथवा व्यापारी या श्रम संगठनों के नारेबाज नेता…। संविधान और कानून ने सांसदी को ‘लाभ का पद’ करार नहीं दिया है।  सांसदों को जनता का प्रतिनिधि, आम आदमी की आवाज, देश का औसत चेहरा और लोकतंत्र का मानवीकरण माना जाता है। लिहाजा वेतन और भत्तों के लिए संसद में लालू यादव सरीखे नेता का भावुक भाषण देना और 80,000 रुपए से ज्यादा वेतन की मांग के साथ सदन के भीतर और बाहर चिल्लाना सांसद की गरिमा के साथ खिलवाड़ है। नारेबाज सांसदों की ये दलीलें बेमानी हैं कि उन्हें 24 घंटे जनता की सेवा में हाजिर रहना पड़ता है, घर के खर्च बढ़ गए हैं, चाय-पानी का सिलसिला जारी है, चुनाव क्षेत्र में विवाह और मातम के मौकों पर जाना पड़ता है। इन खर्चों के बावजूद 2004 और 2009 के लोकसभा चुनावों के अंतराल में लालू यादव की आमदनी करीब 216 फीसदी, कमलनाथ की करीब 173 फीसदी, मणिशंकर अय्यर की करीब 271 फीसदी, शरद पवार की करीब 167 फीसदी और मुलायम सिंह की करीब 250 फीसदी कैसे बढ़ गई? यह खुलासा चुनाव आयोग में दाखिल सांसदों के खुद के हलफनामे में दर्ज है। 315 सांसद करोड़पति कैसे हैं? यह तब है, जब ज्यादातर सांसद कारपोरेट या राजघरानों से नहीं हैं। क्या हमारे गरीब सांसदों की संपदाओं का हिसाब लेने वाला कोई है। हमने अपने लोकतंत्र में ऐसे भूतपूर्व सांसदों और नेताओं को देखा है, जिनके पास एक अदद मकान और वाहन तक नहीं है। कुछेक किसी फाउंडेशन या गैर सरकारी संगठन से जुड़कर अपनी रोटी का जुगाड़ कर पा रहे हैं। दरअसल सवाल यह है कि सांसदों का वेतन, एक औसत कर्मचारी की तर्ज पर क्यों बढ़ाया जाना चाहिए। सांसदों को भूतपूर्व होने के बावजूद, रेल में मुफ्त सफर की सुविधाएं आजीवन हासिल हैं। चिकित्सा सुविधाओं की परिधि मंे पूरा परिवार आता है। दिल्ली में आवास, पानी, बिजली, फोन सरीखी बुनियादी जरूरी सुविधाएं लगभग निःशुल्क हैं। जो भुगतान सांसद को करने पड़ते हैं, उनमें राष्ट्रीय राजधानी में एक झुग्गी की सुविधा भी हासिल नहीं की जा सकती। संविधान, कानून में ये सुविधाएं सरकार इसलिए मुहैया कराती है, क्योंकि सांसद बुनियादी तौर पर जनसेवक हैं। वे राष्ट्रहित में सक्रिय हैं। उनका संसदीय कर्म एक राष्ट्रीय दायित्व है। सांसद अपनी आत्मा में झांक कर सोचें कि क्या वे राष्ट्रीय गणतंत्र के पहरुओं की भूमिका में हैं? यदि हैं, तो संसद में गंभीर बहस और महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा के दौरान वे सदन के बजाय कहां उपस्थित रहते हैं? जब 17 मिनट में चार बिल और चार मिनट में एक महत्त्वपूर्ण बिल ध्वनिमत से पारित करने की रस्म अदायगी की जाती है, तो सांसद का यही संवैधानिक कर्म है क्या? हमारी व्यवस्था में संसद और सांसद सर्वोपरि हैं। वे कानून बनाते हैं और नीतियां तय करते हैं। क्या संसद में, खुद सांसदों द्वारा, अपना वेतन बढ़ाने की परंपरा सम्मानजनक है? इस संदर्भ में, संसदीय समितियों की सिफारिशें भी पूर्वाग्रही मानी जानी चाहिएं, क्योंकि समितियों के सदस्य भी सांसद ही होते हैं। अरुण जेटली सरीखे नेता ने ठीक कहा है कि इस व्यवस्था का विकल्प भी सोचा जाना चाहिए। हमारा मानना है कि पूर्व नौकरशाहों और न्यायाधीशों की एक टीम सांसदों की अर्थव्यवस्था का आकलन करे और उसके मुताबिक सुविधाओं को बढ़ाने का फैसला सरकार करे। इन सुविधाओं को तनख्वाह करार न दिया जाए, क्योंकि सांसद तो देश के नौकरशाहों और कर्मचारियों के लिए वेतन आयोग की सिफारिशें पारित करते हैं। लिहाजा खुद सांसदों को अपनी ओछी हरकतें छोड़ कर एक प्रतिष्ठित भूमिका तैयार करनी चाहिए।

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