सिकुड़ रहा है चांद

वाशिंगटन के वैज्ञानिकों का दावा है कि चांद सिकुड़ रहा है। उन्हें चांद की सतह पर दरारें नजर आई हैं। ये दरारें तब बनती हैं जब चांद ठंडा होकर सिकुड़ता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इसमें खतरे की कोई बात नहीं है, क्योंकि चांद बहुत धीरे-धीरे सिकुड़ रहा है। शोध के मुताबिक, चांद वैसे ही सिकुड़ रहा है, जैसे किसी गुब्बारे से धीरे-धीरे हवा निकल रही हो। इसकी वजह है चांद का अंदर से ठंडा होता जाना। नतीजतन धरती का यह प्राकृतिक उपग्रह सौ मीटर सिकुड़ गया है। स्मिथसोनियन इंस्टीच्यूट के मुख्य वैज्ञानिक डाक्टर थॉमस वाटर्स का कहना है कि अंदर से ठंडा होने पर पहले आकार घटता है और फिर इसकी पूर्ति करने के लिए चांद सिकुड़ता है। वैज्ञानिकों को चांद की सतह की तस्वीरों में ये असामान्य दरारें नजर आईं। पहली बार ऐसी दरारें सत्तर के दशक में अपोलो मिशन की तस्वीरों में देखी गई थीं। वाटर्स ने जोर देकर कहा कि चांद आकार के मामले में धरती का लगभग एक चौथाई है और यह न तो लुप्त होगा न ही इसका असर धरती पर पड़ेगा। शोध का यह नतीजा साइंस जर्नल के ताजा अंक में प्रकाशित हुआ है।

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