सुपरबग पर बवाल

पश्चिमी देशों द्वारा किसी न किसी बहाने भारत की छवि को खंडित करने का अंदाज काफी पुराना है। विश्व प्रसिद्ध पत्रिका लैसेंट में जिस कद्र सुपरबग को लेकर बवाल मचा है, उसे इस तरह की कोशिशों से अलग नहीं देखा जा सकता। सभी तरह के एंटीबायोटिक से प्रभावित सुपरबग के भारत से दुनिया भर में फैलने संबंधी रिपोर्टें एक तरफा तो हैं ही, भारत में पनप रहे स्वास्थ्य पर्यटन को प्रभावित करने की साजिश का हिस्सा भी लगती हैं। इस प्रश्न पर भारत सरकार ने आक्रामक मुद्रा अपनाकर तथा इस कारण पैदा हो रही भ्रांतियों को दूर करने की पहल कर उचित किया है। एनडीएम नाम के इस संक्रामक बैक्टीरिया का संबंध भारत से जोड़ा गया है। यह भी कि नई दिल्ली से इसका दुष्प्रभाव दुनिया भर में फैला है। एक ओर जहां केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने इसे एक वैश्विक घटना ठहराते हुए इसका किसी देश से संबंध न होने की बात कही है, इससे पूर्व कि यह साजिश देश की छवि को और प्रभावित करे, उसकी तह तक पहुंचा जाना चाहिए। हैरानी की बात यह है कि उक्त अध्ययन के लिए यूरोपीय यूनियन तथा दो बड़ी दवाई कंपनियों की तरफ से धन जुटाया गया था। क्या इसका यह अर्थ नहीं निकलता कि यह सब कुछ भारत का रास्ता पकड़ रहे विदेशी पर्यटकों को निरुत्साहित करने के लिए किया जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों से विदेशों से कई पर्यटक भारत में चिकित्सा एवं मेडिकल सुविधा हासिल करने के लिए यहां आते रहे हैं। भारत में चिकित्सा सेवा पश्चिमी देशों के मुकाबले काफी सस्ती व भरोसेमंद रही है। ऐसे में यदि यह बात फैल जाए कि सुपरबग भारत व पाकिस्तान से फैला है, इस तरह के पर्यटन पर तो उसका असर होगा ही। पिछले दिनों इस रिपोर्ट के सहलेखक चेन्नई के कार्तिकेयन कुमार स्वामी स्वयं को इस रिपोर्ट से अलग क्यों न कर चुके हों, अब भी विश्व भर में कुछ प्रश्नचिन्ह मंडरा रहे हैं, कुछ भ्रांतियां भी हुई हैं। भारत को इस रिर्पोट की साजिश को चुपचाप स्वीकार न कर उसके पीछे की असलियत का पता लगाना चाहिए। आज भी चिकित्सा विशेषज्ञ मानते हैं कि सुपरबग या इस तरह के दूसरे सूक्ष्मजीव कहीं भी पाए जा सकते हैं। उन्हें भारत से ही क्यों जोड़ा जाए। यहां यह तथ्य भी किसी से छिपे नहीं हैं कि पिछली कई सदियों से विश्व को ऐसे सूक्ष्म जीवों के अस्तित्व की जानकारी है। फिर भारत का नाम उछालकर यह बवाल क्यों? चिकित्सा व औषधि के क्षेत्र में एंटीबायोटिक औषधियों के अंधाधुंध इस्तेमाल पर विशेषज्ञों में अलग-अलग राय हो सकती है। इसी प्रकार इस तरह के संक्रमण पर भी काबू नहीं पाया जा सका है। सुपरबग को बेअसर करने की तकनीक हालांकि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में विकसित हो चुकी है। इस व्याधि का ठीकरा अकारण भारत के सिर फोड़ने के बजाय उससे निपटने के वैश्विक प्रयास होने चाहिएं। इसके लिए ज्ञान व अनुसंधान के आदान-प्रदान में सहयोग आवश्यक है।

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