सुरों का जादूगर

शहनाई की बात आते ही जब मुंह में मिश्री सी घुलने लगे तो समझिए कि बात बिस्मिल्लाह खान की हो रही है। उस्ताद की मुस्कान ही आधी महफिल लूट लेती थी और आधी उनकी शहनाई। शहनाई उनकी ऐसी सहेली, कि दूसरी दुनिया को कूच करने से पहले भी वह शहनाई पर कजरी की धुन बजा रहे थे

उन्होंने कहा था-यहां मुझे खुदा ने सुरों से जुदा नहीं किया और वहां मैं उससे जुदा नहीं रहूंगा। इन लफ्जों के बाद खां साहब ने किसी से कुछ नहीं कहा। वह सो गए । उन्हें किसी ने नहीं जगाया,उनकी शहनाई ने भी नहीं। यह दूसरी दुनिया का सफर था…भला उन्हें जगाने की हिमाकत कौन कर सकता था। 21 अगस्त की शाम आठ बजे तक मिट्टी से पहले उनकी देह खुले आसमान के नीचे सुकून से भीग रही थी। सुर घुल रहे थे अगले सफर की तैयारी में। बिस्मिल्लाह खान ने शहनाई जैसे लोक वाद्य को शास्त्रीय मंच प्रदान किया। अपने इसी हुनर के बल पर उन्होंने भारतरत्न का गौरव हासिल किया। भारतीय शास्त्रीय संगीतकारों में उनका स्थान अप्रतिम था। जो शहनाई सिर्फ शादी के मंडपों की शोभा थी,वह उनकी कला का सहारा ले कर कंसर्टहॉल तक पहुंच गई। बिहार आज इस बात पर गर्व करता है कि उस्ताद उनके डुमरांव में जन्मे थे । उनके पूर्वज डुमरांव रजवाड़े के शाही संगीतकार थे। उनके चचाजान बनारस के विश्वनाथ मंदिर में शहनाई बजाते थे । उस्ताद ने शहनाई उन्हीं से सीखी।  सन् 1937 में कोलकाता में ऑल इंडिया म्यूजिक कांफ्रेंस का आयोजन हुआ। उस्ताद का प्रोग्राम वहां था। उस दिन उन्होंने ऐसी धुन बजाई कि लोग सन्नाटे में आ गए । यही वह दिन था जब शहनाई शास्रीय मंच पर प्रतिष्ठित हो गई। 15 अगस्त 1947 को उन्होंने आजादी के दिन लाल किले पर शहनाई के सुरों का ऐसा समां बांधा कि लोग मंत्रमुग्ध हो कर रह गए। इसके बाद पहले गणतंत्र दिवस के अवसर पर उनकी शहनाई के दिल को छू लेने वाले जादुई सुरों ने जैसे सम्मोहन सा डाल दिया।  राग काफी में पेश किया गया यह कार्यक्रम लोग बहुत दिनों तक नहीं भूल सके। खान, भारत की गंगाजमुनी संस्कृति की पहचान थे।  वह अल्लाह और सरस्वती दोनों के पुजारी थे। बनारस और गंगा दोनों से उनका अथाह प्यार था। उस्ताद बिस्मल्लाह खान ने कितने ही देेशों  (अफगानिस्तान, यूरोप, ईरान, इराक, कनाडा, पश्चिमी अफ्रीका, यूएसए, रूस, हांगकांग) में अपने सुरों का जादू जगाया।  पद्मभूषण,पद्म विभूषण,पद्मश्री,संगीत नाटक अकादमी अवार्ड तथा तानसेन अवार्ड से वे सम्मानित हुए। और अंततः उन्हें भारत रत्न भी मिला। 21 अगस्त, 2006 में उनकी मृत्यु हुई। यह कितनी अजीब बात थी कि 21 अगस्त 1916 में जन्मे बिस्मिल्लाह खान ने अपनी रुखसती के लिए भी वही तारीख चुनी जो उनके जन्म की थी।

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