सूचना की रक्षा

केंद्रीय मंत्रिमंडल की ताजा बैठक में जिन मुद्दों पर विचार किया गया है, उनमें भ्रष्टाचार के खिलाफ अलख जगाने वाले लोगों को हिफाजत के लिए कानून बनाने के प्रस्ताव खास मायने रखता है। सरकार ने इस मकसद से तैयार किए गए एक विधेयक को मंजूरी दे कर इस ओर अपने ठोस संकल्प का परिचय दिया है। इस विधेयक को संसद की मंजूरी मिलने के बाद भ्रष्ट और घूसखोर नेताओं व अफसरों की पोल खोलना आसान हो पाएगा और इस तरह के मामले उजागर करने वाले सूचना कर्मियों को पर्याप्त सुरक्षा भी मिल पाएगी। हालांकि सरकार केंद्र व राज्य स्तर पर सूचना के अधिकार को मजबूत बनाने तथा ऐसा कर भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के कई दावे करती रही है, ऐसे प्रकरणों की कमी नहीं है, जहां सूचना अधिकार की खातिर कई लोगों की हत्याएं हो चुकी हैं।  ऐसे मामलों में सूचना कर्मियों को भ्रष्ट नेताओं व अधिकारियों की पोल खोलना न केवल महंगा पड़ा, उन्हें अपनी जान भी गंवानी पड़ी। इससे सूचना के अधिकार का प्रायोजन ही विफल हो जाता है। इनमें भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले मंजुनाथ शणमुगम और सत्येंद्र दूबे सहित कई आरटीआई सेवियों की हत्या के मामले अभी तक जन स्मृति में बने हुए हैं। सत्येंद्र दुबे की बिहार में राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण में धांधली उजागर करने के बाद हत्या कर दी गई थी। इस मध्य आए दिन देश के हिस्सों से कहीं न कहीं सूचना सेवियों पर घातक हमलों की वारदातें होती रही हैं। इस वर्ष अब तक ऐसी पांच बड़ी घटनाएं हो चुकी हैं, जिनमें गत जुलाई में अहमदाबाद में अमित जेरुवा की गोली मार कर हत्या सबसे ताजा घटना है। इससे पूर्व लातूर के कांग्रेस सांसद जयंतराव अवाले व उसके दो पुत्रों के खिलाफ जानकारी मांगने वाले दत्तात्रेय पाटिल की हत्या कर दी गई थी। वर्ष के प्रारंभ में पुणे में एक भूमि घोटाले का पर्दाफाश करने वाले एक समाज सेवक की हत्या हुई थी। इस तरह जहां जनता को सूचना का अधिकार दिए जाने का मकसद नाकामयाब होता है, वहीं भ्रष्टाचारियों का बेलगाम होकर घूमना खतरनाक साबित होता है। भ्रष्टाचारियों की करतूतों का पर्दाफाश करने वाले लोग चाहे वे सूचना कर्मी हों या अन्य, सरकार का संरक्षण मिलना ही चाहिए। उस लिहाज से सरकार ने इस आशय के विधेयक में इस तरह की जानकारी देने वाले व्यक्ति की पहचान छिपाकर रखना भी जिम्मेदारी केंद्रीय सतर्कता आयोग को सौंपने का निर्णय उचित किया है। आयोग को ऐेसे लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की शक्ति भी दी जाएगी, जो भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने वाले शख्सों की पहचान सार्वजनिक करते हैं या उसे किसी तरह की धमकियां देते हैं। इससे सूचना के अधिकार जैसी मुहिम को बल मिलेगा। यहां इस बात से सहमत हुआ जा सकता है कि फिजूल शिकायत को देने वाले लोग दंडित हो सकेंगे, वहां सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि केंद्र व राज्य स्तरों पर स्थापित सूचना आयोग के सदस्य या मुखिया के तौर पर उन मीडिया कर्मियों को भी शामिल किया जाए, जिनका केंद्र और मूल्य आधारित पत्रकारिता के प्रति समर्पित रही है। इससे सूचना के अधिकार को और ताकत मिलेगी। अभी कुछेक जगह ही ऐसा हुआ है मूल कानून में इनका विधान है।

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