सौदा नहीं, राष्ट्रीय जवाबदेही

परमाणु जवाबदेही विधेयक के प्रावधानों पर सत्तारूढ़ कांग्रेस और विपक्षी भाजपा के बीच राजनीतिक सहमति का स्वागत किया जाना चाहिए। उसके मद्देनजर, यदि दोनों में कोई ‘सौदेबाजी’ भी हुई है, तो उस पर आपत्ति कैसी? क्योंकि उस कथित ‘सौदे’ से राष्ट्र प्रभावित नहीं है, बल्कि राष्ट्रहित में एक रास्ता खुला है कि संसद में परमाणु जवाबदेही बिल अब पारित हो सकेगा। इस मुद्दे पर सपा, राजद, और लोजपा के सांसदों का सदन में हंगामा करना और दिन भर की कार्रवाई को स्थगन की नियति तक धकेलना न केवल बचकानापन था, बल्कि असंसदीय भी…। परमाणु जवाबदेही बिल हमारा राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय दायित्व है, क्योंकि स्वतंत्र भारत में
आज तक भी कोई कानूनी प्रावधान नहीं है, जिसके तहत परमाणु दुर्घटना की स्थिति में पीडि़तों को मुआवजे की पर्याप्त राहत दी जा सके। दुनिया में 28 देश परमाणु गतिविधियों से जुड़े हैं, लेकिन भारत और पाक ही ऐसे देश हैं, जहां परमाणु हादसे की जवाबदेही और क्षतिपूर्ति का कोई कानून नहीं है, क्योंकि परमाणु ऊर्जा को लेकर केंद्र सरकार, योजना आयोग और पंचसाला योजनाओं के विशेषज्ञों ने भविष्य के लक्ष्य तय दिए हैं। भारत-अमरीका परमाणु करार के बाद हमारा आणविक अलगाव समाप्त हुआ है। रूस, फ्रांस, ब्रिटेन, कनाडा और जापान आदि देशों के साथ हमारे परमाणु करार हो चुके हैं अथवा प्रक्रिया में हैं। यदि परमाणु बाजार में कारोबार करना है, तो उसके कायदे कानून भी मानने पड़ेंगे, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय कंपनियां किसी भी तरह की कानूनी बीमित व्यवस्था  के बिना भारत को परमाणु प्लांट के उपकरण और मशीनरी आदि बेचने को तैयार नहीं हैं, यूरेनियम जैसे परमाणु ईंधन हासिल करने में भी दिक्कतें आ सकती हैं, तो परमाणु बिल हमारी मजबूरी और अनिवार्यता दोनों हैं। यह सिर्फ अमरीकी बाध्यता ही नहीं है। अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा के भारत प्रवास से पहले ही परमाणु जवाबदेही कानून की व्यवस्था प्रतीकात्मक है, क्योंकि परमाणु करार के 123 समझौते को क्रियान्वित भी करना है। मुलायम, लालू और पासवान सरीखे नेताओं की राजनीति ऐसे राष्ट्रीय आयामों को छू तक नहीं सकती। नतीजतन उनकी चिल्ल-पौं भी बिल पर बहस के दौरान  यूपीए सरकार की तरफ से आना चाहिए। क्या इस विधेयक के पारित होने के बाद यह पर्याप्त और समयबद्ध मुआवजे की ठोस व्यवस्था साबित होगा? क्या इसका प्रशासनिक ढांचा इतना सचेत, मुस्तैद और ईमानदार होगा कि परमाणु हादसे के पीडि़त को मुआवजे के लिए दर-ब-दर की ठोकरें न खाना पड़ें? परमाणु ऊर्जा उत्पादन के जोखिमों के प्रबंधन से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाओं के साथ हमारे विधेयक का जुड़ाव और तालमेल कैसा होगा। ध्यान में परमाणु कानून के बाद भारत में विश्व स्तर के परमाणु उद्योग का विस्तार होगा। हालांकि अभी परमाणु ऊर्जा उत्पादन की हमारी हिस्सेदारी सिर्फ तीन फीसदी (चीन की भी) है, जबकि फ्रांस की करीब 78 फीसदी और अमरीका की करीब 19 फीसदी है। साफ है कि अभी हमें बहुत लंबी मंजिलें तय करनी हैं, लेकिन परमाणु दुर्घटना की स्थिति में 1500 करोड़ रुपए के प्रस्तावित मुआवजे से कमोबेश हमारी संवेदनशीलता तो स्पष्ट होती है। आतंकवादी या किसी अन्य हमले के कारण परमाणु दुर्घटना को इस विधेयक के दायरे में क्यों नहीं रखा गया, फिलहाल इसका तार्किक  स्पष्टीकरण नहीं मिला है। हम विएना, पेरिस की अंतरराष्ट्रीय संधियों से भी खुद को तटस्थ क्यों रखना चाहते हैं, कमोबेश सरकार उन कारणों का विस्तृत खुलासा तो करे।

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