कश्मीर पर बयानबाजी

कश्मीर मामले पर चर्चा के लिए गठित तीन सदस्यीय वार्ताकाल दल ने घाटी पहुंच कर कश्मीर मुद्दे का स्थायी समाधान खोजने की पहल की है। इसे लेकर मिश्रित प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है, लेकिन प्रारंभ में ही वार्ताकारों द्वारा दिए गए बयानों और उन्हें केंद्र द्वारा सौंपी गई विषय सूची को लेकर भी कुछ सवाल उठे हैं। कश्मीर समस्या जैसे संवेदनशील विषय पर हालांकि तुरंत किसी फैसले की उम्मीद नहीं की जा सकती। इसके लिए वार्ताकार दल को तथ्य अन्वेषी मिशन से बढ़कर आंकना या स्वयं उसके इस हद से बाहर जाकर कुछ टीका-टिप्पणी करना वाजिब नहीं होगा। अभी तो एक शुरुआत भर हुई है, जिसके तहत वार्ताकारों को कश्मीर के राजनेताओं, अलगाववादी गुटों तथा सामान्य जनता का दिल भांप कर यह परखना है कि वे क्या चाहते हैं और उनके नजरिए से इस मसले का क्या हल हो सकता है। ऐसे में वार्ताकार दल के सदस्य एवं वरिष्ठ पत्रकार दिलीप पडगांवकर द्वारा दिए गए इस बयान को लेकर कि पाकिस्तान को शामिल किए बिना स्थायी समाधान संभव नहीं है, कुछ बवाल मचा है। पडगांवकर ने यहां तक कहा है कि पाकिस्तान को बातचीत में शामिल करना ही होगा। हालांकि जो कुछ पडगांवकर ने कहा है वह नया नहीं है। इस बारे में भारत भी सदा यही कहता आया है कि पाक व भारत को आपसी वार्ता के जरिए एवं शांतिपूर्ण ढंग से इस समस्या का हल खोजना चाहिए। यह भी कि इन प्रयासों में किसी मध्यस्थ की जरूरत नहीं है तथा कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और रहेगा। असल में इस मौके पर और जिन संदर्भों में पडगांवकर का बयान आया है, उसके भिन्न अर्थ भी लिए जा सकते हैं। भले ही वह निराधार ही क्यों न हों। यही कारण है कि भाजपा ने इस विषय पर सरकार का स्पष्टीकरण मांगते हुए वार्ताकार दल के सीमा से बाहर जाने का आरोप भी लगाया है। हमारे यहां प्रश्न राजनीतिक हो या सार्वजनिक जीवन से जुड़े स्वनामधन्य नेताओं का, हमें हर छोटी-बड़ी बात पर बिना कुछ समझे-सोचे बयान देने की एक लत बनी हुई है। ऐसी परिस्थितियों में लोगों को बेतुके बयान देकर अपनी लीडरी चमकाने की जैसे आदत हो गई है। कश्मीर मसले के हल के लिए वार्ताकारों की पहल का पहले ही अलगाववादियों द्वारा विरोध हुआ है। उन्हें तो कोई भी ऐसी स्थिति रास नहीं आ सकती, जिसका मकसद क्या कश्मीर में शांति स्थापित करना या स्थायी समाधान की दिशा में आगे बढ़ना है कि इस तरह की कोशिशों को कड़े विरोध और बहिष्कार के बीचोंबीच अपना रास्ता बनाकर आगे ले जाना होगा अन्यथा हमारे यहां अरुंधति राय जैसे बयानबाजों की कमी नहीं है, जो ऐतिहासिक तथ्यों की अनदेखी कर जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग मानने को तैयार नहीं हैं। उन्होंने भारत में कश्मीर के विलय पर भी प्रश्न उठाया है। इससे पूर्व जम्मू-कश्मीर के उत्साही मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी एक विवादास्पद बयान देकर हंगामा खड़ा किया था। हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हासिल है। इस तरह की आजादी हमारे लोकतंत्र की बड़ी ताकत भी है, लेकिन जब कश्मीर जैसे गंभीर मसले को सुलझाने के प्रयास हो रहे हों, क्या केंद्र के लिए यह तय करना वाजिब नहीं था कि वार्ताकारों को तरह-तरह के बयान देने में संयम बरतने के लिए कहा जाए। आखिर ऐसा क्यों है कि एक ही मुद्दे पर सरकारी स्तर पर अलग-अलग बयान क्यों दिए जाते हैं। ऐसे बयान का क्या लाभ, जो स्थिति में सुधार लाने के बजाय उसे भ्रामक बना दे। हमें उन अलगाववादियों की जुबान बोलने से परहेज करना ही चाहिए, जो दुनिया भर के सामने कश्मीर की गलत तस्वीर पेश करते रहे हैं।

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