भारत की भ्रष्टाचार में ‘तरक्की’

एजेंसियां, नई दिल्ली

सूचना के अधिकार सहित ढेर सारे लंबे-चौड़े कानूनों, सतर्कता और प्रवर्तन एजेंसियों तथा सरकार की निगरानी प्रणालियों के बावजूद भारत भ्रष्टाचार के मकड़जाल से निकल नहीं पा रहा है और भ्रष्टाचार के पैमाने पर वह दुनिया का 87वां सबसे भ्रष्ट देश है। पिछले वर्ष की तुलना में उसकी हालत और खराब हुई है और वह 84 से बढ़कर 87वें नंबर पर पहुंच गया है। गैर सरकारी संगठन ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया ने मंगलवार यहां दुनिया भर के देशों में भ्रष्टाचार से संबंधित आंकडे़ जारी करते हुए कहा है कि भारत को भ्रष्टाचार के दस अंकों के पैमाने में केवल 3.3 अंक मिले हैं और 178 देशों में भ्रष्टाचार के मामले में उसका 87वां नंबर है। यहां तक कि उसके भूटान जैसे छोटे और सैन्य शासन वाले पड़ोसी देश को भी इस पैमाने में 5.7 अंकों के साथ 36वां नंबर हासिल है। भारत की यह हालत तब है, जब इस रिपोर्ट में सितंबर 2010 तक के आंकड़ों को ही शामिल किया गया है। राष्ट्रमंडल खेलों के कथित महाघोटालों से संबंधित शुरुआती जानकारी ही इसमें शामिल हो पाई है। बाद में हुए घोटालों के पिटारे को भी अगर इसमें शामिल कर दिया जाए, तो भारत की स्थिति का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। डेनमार्क, न्यूजीलैंड और सिंगापुर 9.3 अंकों के साथ सबसे कम भ्रष्ट देश हैं, जबकि सोमालिया 1.1 अंक के साथ सबसे अधिक भ्रष्ट देश है और भ्रष्टाचार के मामले में उसका नंबर 178वां है। इसके बाद अफगानिस्तान और म्यांमार 1.4 अंकों के साथ दूसरे तथा तीसरे सबसे भ्रष्ट देश हैं। ब्रिटेन 7.6 अंकों के साथ 20वां और अमरीका 7.1 अंकों के साथ दुनिया का 22वां सबसे अधिक भ्रष्ट देश है। चीन भारत से थोड़ा आगे 3.5 अंकों के साथ 78वां सबसे भ्रष्ट देश है। दक्षिण एशियाई देशों में पाकिस्तान, नेपाल तथा मालद्वीप 2.3 अंकों के साथ 143 वें, बांग्लादेश 2.4 अंकों के साथ 134वें और श्रीलंका 3.2 अंकों  के साथ 91वें स्थान पर है।

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया के अध्यक्ष पीएस बावा ने ये आंकड़े जारी किए। हांलाकि यह पैमाना अवधारण पर आधारित है, लेकिन इसके परिणाम पूरी तरह वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित हैं। उन्होंने कहा कि ये आंकड़े किसी भी देश की सरकारी संस्थाओं और सरकारी कंपनियों में भ्रष्टाचार के आधार पर जुटाए जाते हैं और निजी क्षेत्र तथा आम आदमी को इसमें शामिल नहीं किया जाता है।

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