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‘सुंदर मुंदरिए’ बीते जमाने की बात

नालागढ़ —  आधुनिक युग, इंटरनेट व पाश्चात्य संस्कृति पर्वों पर भारी नजर पड़ती आ रही है। लोहड़ी पर्व पर जहां सुंदर मुंदरिए जैसे गीतों का पहला प्रचलन होता था और लोहड़ी पर्व से एक पखवाड़े पूर्व इसकी तैयारियां शुरू हो जाती थीं, आज के आधुनिक दौर में यह सब अब सपना बनकर रह गया है। लोहड़ी पर्व पर जहां सुंदर मुंदरिए के बोल सुनाई नहीं देते, वहीं लोहड़ी मांगते हुए बच्चों की पुकारें भी आधुनिकता की चकाचौंध में गुम नजर आती हैं।  जानकारी के अनुसार लोहड़ी पर्व पर जहां करीब 300 सालों से मनाए जाने वाले ऐतिहासिक पीरस्थान लोहड़ी मेले की आस्था आज भी बरकरार है, वहीं लोहड़ी पर्व पर वैसी चकाचौंध नजर नहीं आती, जो कुछ सालों पहले हुआ करती थी। बता दें कि आज से कुछ सालों पहले लोहड़ी पर्व का अपना ही एक विशेष क्रेज होता था और इसकी तैयारियों को लेकर लोगों सहित बच्चों में भी खासा उत्साह होता था। लोहड़ी पर्व पर जलाए जाने वाले अलाव के लिए जहां प्रत्येक घर से एक-एक लकड़ी एकत्रित की जाती थी, वहीं गोबर के उपले भी जलाने के लिए इकट्ठे किए जाते थे। इन सभी की पूजा-अर्चना की जाती थी और समस्त घरों के लोग एक स्थान पर एकत्रित होते थे। एकत्रित की गई लकडि़यों व गोबर के उपले जलाए जाते थे और महिलाएं सुंदर मुंदरिए का गीत गाती थी, जिससे पर्व की एक अपनी ही शान होती थी। गौरतलब है कि आज की आधुनिकता की दौड़, इंटरनेट व पाश्चात्य संस्कृति का बोलबाला बढ़ गया है, वहीं पर्वों की अहमियत धीरे-धीरे कम होने लगी है। आज की पीढ़ी आधुनिकता की ओर अधिक भाग रही है, जबकि प्राचीन विरासतों, धरोहरों व पर्वों की अहमियत को भूलती जा रही है। आज की पीढ़ी आधुनिक दौर में चल रहे प्रचलनों की ओर अधिक आकर्षित हो रही है। नालागढ़ शहर के वरिष्ठ नागरिक एवं समाजसेवी सुरजीत डंडोरा के मुताबिक पहले यह दौर होता कि सभी घरों के लोग एकत्रित होकर लोहड़ी का पर्व मनाते थे। इसके लिए बाकायदा प्रत्येक घर से लकड़ी और गोबर के उपले एकत्रित किए जाते थे, जिनकी पूजा-अर्चना के बाद महिलाएं सुंदर मुंदरिए का गीत गुनगुनाती थी, लेकिन आज के दौर में यह प्रचलन धीरे-धीरे कम होने लगा है। सुरजीत डंडोरा ने कहा कि पुरानी परंपराओं के मुकाबले आज की आधुनिक परंपराएं पूरी तरह से बौनी हैं। उन्होंने कहा कि लोगों को अपनी सभ्यता को नहीं भूलना चाहिए और अपनी संस्कृति को कायम रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि इतिहास बढ़ाना है तो प्राचीन परंपराओं को बढ़ाना होगा। उन्होंने कहा कि आज की भागमभाग के दौर में लोग अपने आप में इस कद्र मशगूल हो गए हैं कि पर्वों की अहमियत को भूलते जा रहे हैं और शगुन के तौर पर पर्वों को मना रहे हैं।

 

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