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एक आम महिला की व्यथा

लाहौलां की कथा

लोक कथाओं, लोकगीत, लोक संगीत, विश्वासों और आस्थाओं की यह सबसे बड़ी पूंजी भी है और ताकत भी कि इनकी जड़ें लोकमानस में गहरे से जुड़ी होती हैं। यह सामान्य लोक ही इनका संरक्षक भी है। ‘लाहौलां की कथा’ छपने पर शायद लेखिका सपना ठाकुर ने भी नहीं सोचा होगा कि इसकी इतनी तीव्र प्रतिक्रिया होगी, क्योंकि पांच दिसंबर को प्रकाशित उनकी कथा का रूप ही अधिकतर सुनने को मिलता है…

सर्वप्रथम ‘प्रतिबिंब’ के अंतर्गत लोक संस्कृति से संबद्ध महिला की सामाजिक स्थिति को दर्शाती एक मार्मिक लोककथा को दो अंकों में प्रकाशित करने के लिए ‘दिव्य हिमाचल’ को हार्दिक साधुवाद। लाहौलां की कथा इस क्षेत्र की बहुश्रुत लोककथा है, जिसके बारे में कई परस्पर विरोधी कथाएं भी सुनने को मिलती हैं। ऐसा होना नितांत स्वाभाविक है। क्योंकि लोककथाएं या ऐसी घटनाएं जो कथा का रूप ले लेती है, के बारे में हमारे यहां प्रमाणिक जानकारी का प्राय अभाव ही रहता है। सब कुछ लोक के विश्वास, आस्था और मान्यताओं के बल पर चलता है। लोक कथाओं, लोकगीत, लोक संगीत, विश्वासों और आस्थाओं की यह सबसे बड़ी पंूजी भी है और ताकत भी कि इनकी जड़ें लोकमानस में गहरे से जुड़ी होती हैं। यह सामान्य लोक ही इनका संरक्षक भी है। ‘लाहौलां की कथा’ छपने पर शायद लेखिका सपना ठाकुर ने भी नहीं सोचा होगा कि इसकी इतनी तीव्र प्रतिक्रिया होगी, क्योंकि पांच दिसंबर को प्रकाशित उनकी कथा का रूप ही अधिकतर सुनने को मिलता है। निश्चित रूप से उन्होंने वहीं लिखा है, जो प्रायः लोक मान्यता के रूप में जाना जाता है। आपके कथनानुसार इस लेख पर सहमति-असहमति के कई पत्र प्राप्त हुए। यह एक शुभ संकेत है कि आज भी लोगांे में पढ़ने की खब्त है और अपनी लोक विरासत के प्रति जागरूक हैं। बेहतर होता कि ये प्रतिक्रियाएं रचनाकार के नाम पर आती, तो उन्हें और अधिक प्रोत्साहन मिलता।

लाहौलां की कथा के प्रकाशन के बाद शेर सिंह कमल के कलाकार मन में भी हलचल हुई और उन्होंने भी लाहौलां की कथा लिख डाली, इस दावे के साथ की ये अधिक प्रमाणित है। पहले की कथा और कमल जी की कथा में अंतर तो है, परंतु मूलभूत  अंतर नहीं है। मूलभूत कथा स्वरूप हमारे समाज में महिला की दशा और उससे जुड़ी सोच को लेकर है। आखिर यह अब महिला के साथ ही क्यों घटित होता है कि उसे जिंदगी के सबसे खूबसूरत और बेजोड़ दिन पर मरने का अतिघातक फैसला लेना पड़ता है। दोनों कथाओं में नायिका लाहौलां है और वो त्रासद स्थितियों में मौत को गले लगाती हैं। निश्चित रूप से यह सच्ची घटना रही होगी और इसके दर्दनाक अंत को लेकर लोकमानस द्रवित हो उठा होगा और सामान्य सी लड़की लाहौलां एक लोकनायिका बन गई। जो आज भी लोकगीतों और मेलों के रूप में जीवित है।

शेर सिंह ने जिस कथा का जिक्र किया है वह सामान्य प्रचलित कथा से अलग जरूर है, लेकिन समय के बारे में वह मौन हैं। आखिर यह घटना कब हुई? सौ, दो या तीन सौ साल पहले? मंडी के किस राजा के राज के वक्त यह सब कुछ घटा? चाहे जब भी यह घटना घटित हुई हो यह स्त्री विमर्श से संबद्ध एक लोकश्रुति है और सरकाघाट क्षेत्र में ही इसका अधिक विस्तार है। इसके बाद तुंगलघाटी और मंडी शहर में भी यह कथा सुनने को मिलती है। शेर सिंह जी ने जिन दो गीतों का हवाला दिया है वह लोकगीत ही अधिक सुनने को मिलते हैं और मंडयाली लोक संगीत में अधिक लोकप्रिय हैं या कहे घर-घर में गाए, सुने जाते हैं। प्रसिद्ध, चर्चित मांडण्य कला मंच, मंडी ने कई स्थानों (हिमाचल से बाहर भी) इन लोकगीतों को अपनी प्रस्तुति का माध्यम बनाया है। आज की स्थितियों में लाहौलां की कथा की अधिक प्रासंगिकता है।

एक ओर हम बेटी बचाआ जैसे जनआंदोलनों को अपनाने पर जोर दे रहे हैं लाहौलां की कथा, असल में बेटी की कथा है उसके अपने मन की व्यथा है कि जीवन जीने का अधिकार उसका अपना है। वह अपने जीवन का फैसला अपनी इच्छानुसार क्यों नहीं कर सकती? यह प्रश्न आज भी उत्तर ढूंढ रहा है और तब भी जब लाहौलां ने पिंगला खड्ड की आल में छलांग लगाई थी। यह संयोग ही है कि दोनों लेखों मं से एक महिला ने लिखा है दूसरा पुरुष ने। लाहौलां की कथा में भी तो यही कहानी है।

दोनों रचनाकारों और ‘दिव्य हिमाचल’ को पुनः बधाई।

— हंसराज भारती, बसंतपुर,  सरकाघाट, मंडी

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