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पाश्चात्य के मोह में पीछे छूटती लोक संस्कृति

( अनुज कुमार आचार्य  लेखक, बैजनाथ से हैं )

आधुनिकता की दौड़ में हिमाचल के लोग, विशेष रूप से युवा कदमताल करते नजर आते हैं। ऐसे में स्वाभाविक ही है कि हमारी प्राचीन सांस्कृतिक परंपराएं कहीं पीछे छूटती नजर आएंगी। फैशनपरस्ती ने पारंपरिक परिधानों के ऊपर बढ़त बना ली है, तो वहीं हमारी लोक संस्कृति पर डीजे संस्कृति हावी हो गई है…

हिमाचल प्रदेश देवभूमि के नाम से तो मशहूर है ही, वहीं अपनी प्राचीन संस्कृति, समृद्ध सांस्कृतिक विरासत एवं परंपराओं के लिए भी विश्वविख्यात है। हमारी पुरातन लोक संस्कृति में हमारे प्राचीन देवालय, शक्तिपीठ, गीत-संगीत, प्राचीन वाद्ययंत्र, खान-पान एवं पारंपरिक वेशभूषाएं शामिल हैं। आजादी के बाद अप्रैल, 1948 में केंद्र  शासित प्रदेश के रूप में अस्तित्व में आने और 25 जनवरी, 1971 को भारतीय गणराज्य का 18वां राज्य बनने के बाद से हिमाचल प्रदेश ने शिक्षा एवं विकास के क्षेत्र में एक लंबी छलांग लगाई है। वर्तमान समय में हिमाचली नित नए क्षेत्रों में अपनी छाप छोड़ रहे हैं और अपना एवं प्रदेश का नाम रोशन कर रहे हैं। आधुनिकता की दौड़ में अब हिमाचल प्रदेश के लोग, विशेष रूप से हमारी युवा पीढ़ी कदमताल करती नजर आती है। ऐसे में स्वाभाविक ही है कि हमारी प्राचीन सांस्कृतिक परंपराएं कहीं पीछे छूटती नजर आएंगी। फैशनपरस्ती ने पारंपरिक परिधानों के ऊपर बढ़त बना ली है, तो वहीं हमारी लोक संस्कृति पर डीजे संस्कृति हावी हो गई है। इसलिए यह आवाज उठाना जायज ही है कि किस प्रकार से हिमाचल प्रदेश की परंपरागत पुरातन लोक संस्कृति को जीवंत रखा जाए। अभी पिछले दिनों एक विवाह समारोह में धाम के दौरान कांगड़ा घाटी के जिया नामक गांव के मशहूर लोक गायक कश्मीरी लाल से भेंट हुई, तो वार्तालाप के दौरान डीजे संस्कृति के बढ़ते प्रभाव के कारण हिमाचली लोक गायन पर पड़ रहे विपरीत प्रभाव का दर्द उनकी जुबां पर आ ही गया। वाद्य यंत्रों खंजरी, रबाना और मुशादा के साथ अपने साथी सोनू की ढोलक की ताल पर कांगड़ा-चंबा के संगीत एवं लोक गायन को नई पहचान देने वाले कश्मीरी लाल के गाए जाने वाले गीतों, ‘शिव कैलाशों के वासी’, ‘नया जमाना आई गेया’, ‘सोणी-सोणी शिमले री सड़कां जिंदे’, ‘कुंजू चंचलो’ और ‘बडि़यां जो तुड़का लाणा ठेकेदारनिए’ की श्रोताओं में बेहद मांग रहती है।

इनका मानना है कि हिमाचल प्रदेश में जिला, राज्य एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर के उत्सवों में आयोजित होने वाली धार्मिक-सांस्कृतिक संध्याओं में ज्यादा से ज्यादा हिमाचली लोक गायकों और कलाकारों को उचित मान-सम्मान एवं मानदेय देकर मंच देने की जरूरत है, ताकि हिमाचल प्रदेश की नई युवा पीढ़ी को अपनी पुरातन संस्कृति से जोड़ा जा सके। इसके अलावा प्रदेश के लोक संस्कृति विभाग, आकाशवाणी और दूरदर्शन केंद्रों के कार्यक्रमों में भी नियमित रूप से हिमाचली पारंपरिक वाद्य संगीत एवं गायन से जुड़ी हस्तियों को बुलावा मिले, यह आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है। अमूमन यह भी देखने को मिलता है कि हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा आयोजित होने वाली सांस्कृतिक संध्याओं में बड़ी मात्रा में पंजाबी एवं मुंबइया कलाकारों को तरजीह दी जाती है। उन पर भारी भरकम राशि भी लुटाई जाती है, जबकि चंदेक हिमाचली कलाकारों को छोड़कर अधिकतर युवा हिमाचली गायकों को मुट्ठी भर मानदेय देकर चलता कर दिया जाता है। यह भी उतना ही सत्य है कि पंजाब और मुंबई सहित अन्य राज्यों में हिमाचल के कलाकारों को शायद ही नियमित अंतराल पर अपनी कला का प्रदर्शन करने के लिए आमंत्रित किया जाता हो? हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा-चंबा घाटी के संस्कार गीतों में हस्नु खेलनूं, मुंडन, यज्ञोपवीत एवं विवाह संस्कारों में गाए जाने वाले गीतों के बारे हमारी नई पीढ़ी लगभग नावाकिफ है। कारण स्पष्ट है, एक तो एकल परिवारों का चलन, ऊपर से पठन-पाठन की बाध्यता, तीसरे पाश्चात्य संस्कृति का बढ़ता प्रभाव। पहले पंजाप-गूंतर में ढोलक की थाप पर जन्म संस्कार गीत गाए जाते थे।

घरों में नाते-रिश्तेदारों के आने से उत्सव का माहौल होता था। और तो और, शादियों में जब बारात को आंगन में बिठाकर घरों की ऊपर वाली खिड़कियों में महिलाओं एवं नवयुवतियों के झुंड अपने गीतों में, जिन्हें पारंपरिक शब्दावली में गालियां कहा जाता था, कुछ खास-खास बारातियों के नाम लेकर उलाहने एवं गीत गातीं थीं, तो बरबस ही सभी का ध्यान ऐसे सुंदर नजारों पर केंद्रित हो जाता था। लेकिन आज मैरिज पैलेसों के चलन के चलते ऐसे आयोजन हमारी संस्कृति से गायब हो चुके हैं। हालांकि पिछले वर्ष आकाशवाणी धर्मशाला केंद्र द्वारा ऐसे सभी संस्कारों से जुड़े गीत-संगीत की रिकार्डिंग करके सौ से ज्यादा संस्कार गीतों का संकलन करने की सराहनीय पहल भी की गई है। पारंपरिक मांगलिक कार्यक्रमों एवं सांस्कृतिक समारोहों में बजाए जाने वाले वाद्य यंत्रों जैसे कि झांझ, मजीरा, खड़ताल, चिमटा, घडि़याल, थाली, घुंघरू, ढोलकू, नगाड़ा, ढमामा, दमगट, नगारट, गुज्जू, डोरू, हुड़क, रणसिंगा, करनाल, तुरही, बांसुरी और शहनाई बजाने वाले लोक कलाकारों को संरक्षण एवं प्रोत्साहन मिले और हिमाचल प्रदेश की संस्कृति की अनूठी पहचान बनी रहे, इसके लिए विशेष प्रावधान करने होंगे। इसी तरह से हम हिमाचल की समृद्ध लोक संस्कृति की धरोहर को सहेज पाएंगे और अपनी आने वाली पीढि़यों को हस्तांतरित करने में सक्षम होंगे। हिमाचली जनता को भी चाहिए कि प्रदेश के बाहर के लटके-झटके वाली मनोरंजन शैलियों के विपरीत अपने पारंपरिक गीत-संगीत एवं कलाकारों को प्रोत्साहन दें।

ई-मेल : rmpanuj@gmail.com

January 12th, 2017

 
 

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