भूखे पेट सरहद पर जवान

सरहद पर तैनात बीएसएफ के जवान तेज बहादुर यादव ने खराब खाने को लेकर जो खुलासे किए हैं, बेशक वे सनसनीखेज और गंभीर किस्म के हैं। एक बात शुरू में ही साफ कर दें कि जवान के आरोपों के मद्देनजर ही हम किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचना चाहते। सेना और अर्द्धसैन्य बलों का सम्मान देश के लिए सर्वोपरि है, उन्हें शत-शत नमन, लेकिन यह मुद्दा ही ऐसा है, जो जवानों की बुनियादी सुख-सुविधाओं और मनोबल से जुड़ा है। बहरहाल गृह मंत्रालय के स्तर पर जांच जारी है और बीएसएफ के महानिदेशक ने अपनी रपट मंत्रालय को भेज दी है, लेकिन सोशल मीडिया पर जो वीडियो वायरल हुआ है, उसमें सचित्र प्रमाण है, जिसे कोई भी आंख वाला देख सकता है और औसत बुद्धि वाला समझ भी सकता है। एक बीएसएफ जवान बर्फ, धुंध, शीतलहर में अपनी पोस्ट पर घंटों तैनात रहता है। हरेक हलचल पर वह चौंक जाता है और हरेक सरसराहट पर वह सचेत हो उठता है। वह देश की सरहद का प्रथम प्रहरी है, सेना तो काफी बाद में आती है। खराब खाने के आरोप कोई पहली बार नहीं लगे हैं। कैग, 2010 की रपट के मुताबिक औसतन 68 फीसदी जवानों ने माना था कि उन्हें खराब खाना दिया जाता है। खाने में दाल, घी, तेल, शक्कर, दूध आदि की आपूर्ति कम पाई गई। कई जगह राशन एक्सपायरी डेट का था। उत्तरी, पश्चिमी, दक्षिणी कमान में इस संबंध में गड़बडि़यां भी पाई गईं। कैग की रपट जुलाई, 2006 में संसद में पेश भी की गई। यदि कैग सरीखी संस्था के ऐसे निष्कर्ष हैं, तो प्रथम दृष्टया जवान तेज बहादुर के आरोप भी सच्चे लगते हैं। यह दीगर है कि बीएसएफ का शीर्ष नेतृत्व उस जवान को मानसिक तौर पर अस्वस्थ करार देने में जुट गया है। उसे अनुशासनहीन साबित करने की भी कवायद शुरू हो गई है। यदि जवान ऐसा है, तो उसे सरहद पर तैनात क्यों किया गया? यह तो नेतृत्व के स्तर पर एक अपराध है, देश की सुरक्षा संग खिलवाड़ है। एक अधिकारी ने मीडिया को ब्रीफ किया कि 2010 में उसका कोर्ट मार्शल भी किया जा चुका है। अब वीआरएस लेने के लिए उसने ये आरोप लगाए हैं। बीएसएफ का यथार्थ भी सवालिया है। रपट है कि 2010 और 2012 के बीच 15990 जवानों ने बीएसएफ को छोड़ा और 302 जवानों ने आत्महत्या की। तनाव के जो कारण बताए जाते हैं, उनमें खराब खाना भी एक प्रमुख कारण है। यह शोध आईआईएम अहमदाबाद ने तैयार किया है। दरअसल मुद्दा खराब खाने या जवानों के भूखे पेट ही सोने का है। वीडियो के चित्र सब कुछ बयां करते हैं कि रोटी जली हुई है। दाल पानी-पानी है, जिसमें सिर्फ हल्दी और नमक हो सकते हैं। प्याज, मिर्च, मसालों का तड़का गायब है। जवान ने कहा है कि एक जला हुआ परांठा और चाय का गिलास ही नाश्ता होता है। तेज बहादुर का यह वीडियो करीब 26 लाख लोगों ने देखा है और 15 लाख ने शेयर भी किया। फिर भी हम मान सकते हैं कि ऐसा कभी-कभार हुआ होगा या जवान के आरोप निजी होंगे। लेकिन इन आरोपों को तब तक पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता, जब तक एक निष्पक्ष जांच के निष्कर्ष सामने नहीं आ जाते। यदि वीडियो वाकई सच बयां कर रहा है, तो देश के लिए यह शर्मिंदगी की बात है। ऐसा करने के दोषी अफसरों को डूब मरना चाहिए। जवान का यह भी आरोप है कि अफसर राशन बेच कर खा जाते हैं, जबकि भारत सरकार तो सब कुछ मुहैया कराती है। जवान ने प्रधानमंत्री मोदी के दखल की भी अपेक्षा की है। गृह मंत्री राजनाथ सिंह की सराहना की जानी चाहिए कि जवान के गंभीर आरोप सामने आते ही उन्होंने गृह सचिव को तुरंत कार्रवाई के आदेश दिए। गृह मंत्री ने साफ तौर पर कहा है कि सुरक्षा बलों के खाने की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। जवानों के खान-पान, अन्य सुविधाओं और सेवाओं से जुड़ी आपूर्ति में खामियों को जल्द ही दूर किया जाए। दरअसल अंतरराष्ट्रीय सरहद पर देश की सुरक्षा में तैनात सैनिकों, जवानों को पर्याप्त कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन वाला संपूर्ण भोजन दिया जाना चाहिए। दावा तो यह किया जाता है कि प्रत्येक जवान के भोजन पर 2950 रुपए माहवार खर्च किए जाते हैं और जवानों को 2900 कैलोरी रोजाना का भोजन मुहैया कराया जाता है, लेकिन वीडियो में दिखाए भोजन से ऐसे दावे खोखले प्रतीत होते हैं। हमें संयुक्त राष्ट्र मिशन से भी सबक सीखना चाहिए, तो 5000 कैलोरी वाला भोजन हर रोज मुहैया कराता है। बहरहाल तेज बहादुर को नियंत्रण रेखा से हटाकर मुख्यालय भेजा गया है। बाद में जवान ने मीडिया को बताया कि उसे प्लंबर का काम दिया गया है। सवाल तो यह भी है कि तेज बहादुर मानसिक तौर पर अस्वस्थ था, तो उसे 14 अवार्ड कैसे मिले? सवाल अनुशासनहीनता का नहीं है। वह अलग मुद्दा है, लेकिन संवेदनशील मुद्दा खराब खाने का है, उसमें भ्रष्टाचार की गंध भी आ रही है, लिहाजा जांच बेहद गंभीरता और निष्पक्षता से होनी चाहिए।

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