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लोक देवता ख्वाजा पीर

यही तो इन लोक-देवताओं की वास्तविकता का प्रमाण है। फिर इनसे क्षमा-याचना करके और दूध, दही, रोट, चूरमां, खीर तथा बलेई आदि देवता से संबंधित पकवान भेंट किया जाता है। तब दूध में खून आना अपने आप ही बंद हो जाता है। यदि इन लोक देवताओं में ऐसी-एसी करामातें न हों तो इन्हें मानें कौन? इसके अतिरिक्त ख्वाजा पीर की छोटी-छोटी मढि़यां भी कहीं-कहीं मिलती हैं…

ख्वाजा पीर भी अन्य लोक देवाताओं की भांति यहां के श्रमिक-कृषक वर्ग का मान्य लोक देवता है। इसे भी लोग खेतरपाल, जक्ख तथा लखदाता की भांति ही मानते हैं। जिनका ख्वाजा पीर होता है वह खेतरपाल, जक्ख या लखदाता को नहीं मानते। अर्थात इनमें से एक परिवार केवल एक ही देवता को मानता है, सभी को नहीं। इसलिए कइयों को खेतरपाल होता है तो कइयों को लखदाता। इसी प्रकार कुछ जक्ख को मानते हैं तो कुछ ख्वाजा पीर को। एक परिवार इनमें से किसी एक देवता पर ही अपने पशुओं की देखभाल तथा फसलों की रखवाली का जिम्मा सौंपता है। ख्वाजा पीर का कोई स्थान, मढ़ी, मंदिर आदि नहीं होते। इसकी पूजा निकटवर्ती नदी, नाले के किनारे ही की जाती है। यह पूजा नदी-नालों के किनारे कहीं भी की जा सकती है। इसका निश्चित स्थान नहीं होता है। पूजा में रोट का ‘चूरमां’ तथा हलवा और दूध, दहीं व घी चढ़ाया जाता है। केले के पत्ते पर इन सभी वस्तुओं को सजाकर फिर धूप तथा दीपक जलाकर श्रद्धा के साथ नदी- नाले में बहा दिया जाता है। इसे ख्वाजा पीर को बेड़ा भेंट करना कहते हैं। जब भी परिवार में भैंस दूध देने लगती है तो इस प्रकार ख्वाजा पीर की पूजा की जाती है। इसके अतिरिक्त नई फसल के निकलने पर भी उपरोक्त बेड़ा नदी-नाले में बहाया जाता है। इस प्रकार से शिवालिक जनपद के श्रमिक-कृषक वर्ग मंे ख्वाजा पीर की मान्यता है।

इस जनपद के श्रमिक-कृषक जब कोई पशु खरीदते हैं तो उसकी रखवाली पीर अथवा जक्ख या खेतरपाल आदि उस लोक देवता के ऊपर छोड़ देते हैं, जिससे वह परिवार जुड़ा होता है। जब गाय अथवा भैंस दूध देने लगती है तो सबसे पहली दूध की भेंट इन्हीं लोक देवताओं को अर्पित की जाती है। ऐसा न करने से दूध में खून उतर आता है जिसे लोक भाषा में ‘खोट’ कहते हैं। यही तो इन लोक-देवताओं की वास्तविकता का प्रमाण है। फिर इनसे क्षमा-याचना करके और दूध, दही, रोट, चूरमां, खीर तथा बलेई आदि देवता से संबंधित पकवान भेंट किया जाता है। तब दूध में खून आना अपने आप ही बंद हो जाता है। यदि इन लोक देवताओं में ऐसी-एसी करामातें न हों तो इन्हें मानें कौन? इसके अतिरिक्त ख्वाजा पीर की छोटी-छोटी मढि़यां भी कहीं-कहीं मिलती हैं। इनके अंदर एक कच्चे पत्थर का चिराग होता है, जिसमें तीन दीपकों के लिए ऊपर जगह होती है और एक दीपक की जगह तीन चिरागों के दाहिनी ओर नीचे बनी होती है। क्षेत्र में जहां ऐसी मढ़ी होती है, उसकी पूजा वहां का ही एक किसान-श्रमिक परिवार करता है। वैसे तो इस जनपद में ख्वाजा पीर के छिंज मेले सदियों से नदी नालों के किनारे ही हुआ करते हैं, परंतु इन मढ़ी वाले ख्वाजा पीर की छिंज वहीं मढ़ी के पास ही छोटे-छोटे बाल-गोपालों की कुश्ती करवाकर ही करवाई जाती है।

इसे उस मढ़ी से संबंधित परिवार हर वर्ष या तीसरे वर्ष अवश्य करवाता है। इसके अतिरिक्त यदि किसीअन्य परिवार की कोई ‘सुक्खण’ (मनौती) उस मढ़ी के ख्वाजा पीर बाबा पूरी करते हैं तो वह भी वहीं बाल-गोपालों की कुश्ती करवाकर मनौती के अनुसार अपना वचन निभाता है। इस छिंज में बाल-गोपालों को हलवे और चूरमें तथा गुड़ का प्रसाद और दक्षिणा में अपनी सामर्थ्नुसार पैसे भी दिए जाते हैं। इसके अतिरिक्त अन्य वहां पधारे दर्शकों को भी प्रसाद बांटा जाता है। मढ़ी के अंदर जो चिराग होता है, वही ख्वाजा पीर का निशान कहलाता है। यही चिराग देशी घी से तिल या अलसी के तेल से जलाए जाते हैं। इसके साथ तिल, गुड़ और चावलों में देशी घी मिलाकर किसी पीतल या मिट्टी के बरतन में आग के अंगारे रखकर, उन अंगारों पर घी में मिली वस्तुओं को रखकर भंखारा धुखाकर वहीं चिरागों के आगे रख दिया जाता है। तीन चिरागों से नीचे उसी पत्थर में जो चिराग होता है, वह ख्वाजा पीर बाबा के सेवक भैरों बाबा का होता है। ख्वाजा पीर की एक विशेषता यह भी है कि यह एक सच्चा न्यायाधीश भी है।

यदि कोई आपकी किसी वस्तु को चुरा लेता है और आपको कोई पता नहीं लगता कि अमुक वस्तु कौन चुरा ले गया तथा यदि कोई आप पर झूठा आरोप लगाता है या कोई ऐसी बात जिसमें आपका कोई अपराध न हो, परंतु आप में सच्चाई का होना अत्यंत अनिवार्य है, तब आप किसी ख्वाजा पीर देवता की मढ़ी पर जाकर चिराग को शुद्ध जल से स्नान कराएं और फिर गंध, पुष्प, फल और नवैद्य के साथ चूरमां तथा हलवा भेंट करके चिरागों को देशी घी अथवा दिल या अलसी के तेल से जलाकर व भंखारा धुखा कर अपनी फरियाद ख्वाजा पीर बाबा से करें….। महाराज! मेरी अमुक वस्तु चोरी हो गई है, कृपया वह मुझे मिल जानी चाहिए। मैं आपकी सेवा में अमुक वस्तु भेंट चढ़ाऊंगा, चढ़ाऊंगी या तेरी छिंज दूंगा/दूंगी।

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