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वांग्ला साहित्य के पुरोधा शंखा घोष

वांग्ला साहित्य के पुरोधा शंखा घोषआधुनिक बांग्ला साहित्य के लब्ध प्रतिष्ठित कवि शंखा घोष को वर्ष 2016 का ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया जाएगा। दो दशकों के बाद किसी बांग्ला लेखक को देश का सर्वोच्च साहित्य पुरस्कार प्रदान किया गया है। 23 दिसंबर, 2016 को बांग्ला साहित्य के प्रसिद्ध कवि शंखा घोष को वर्ष 2016 का प्रतिष्ठित ‘52वां ज्ञानपीठ पुरस्कार’ प्रदान किए जाने की घोषणा की गई। शंखा घोष का जन्म 6 फरवरी, 1932 को चंादपुर जिला(अब बांग्लादेश में है)में हुआ। कोलकाता के प्रेसिडेंसी कालेज से 1951 में उन्होंने बांग्ला भाषा में कला में स्नातक डिग्री हासिल की। यूनिवर्सिटी ऑफ कोलकाता से उन्होंने मास्टर डिग्री हासिल की। यूनिवर्सिटी ऑफ कोलकाता की स्थापना 24 जनवरी, 1857 को हुई। वह शिक्षा से जुड़े रहे हैं। उन्होंने कई शैक्षिक संस्थाओं में अध्यापन किया है, जिसमें यूनिवर्सिटी ऑफ कोलकाता से संबद्ध बंगबासी कालेज और सिटी कालेज भी शामिल हैं। वह 1992 में जाधवपुर यूनिवर्सिटी से रिटायर हुए थे। 1960 में अमरीका में लोवा राइटर्स वर्कशॉप में भी शामिल हुए। उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी, शिमला में द इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ एडवांस स्टडी और विश्व भारती यूनिवर्सिटी में भी लेक्चरार के रूप में अपनी सेवाएं दी हैं। 84 वर्षीय शंखा घोष को आधुनिक बांग्ला साहित्य के पुरोधाओं में से एक माना जाता है तथा उन्हें रबींद्रनाथ टैगोर के साहित्य पर एक प्रमुख ज्ञाता माना जाता है। वह इस पुरस्कार को पाने वाले छठवें बांग्ला लेखक हैं। शंखा घोष की प्रमुख रचनाओं में आदिम लता-गुलमोमॉय, मूर्खा बारो-सामाजिक न्याय, बाबारेर प्रार्थना आदि शामिल हैं।

पुरस्कार

* साहित्य अकादमी पुरस्कार(1977, 1999)

* पद्म भूषण (2011)

ज्ञानपीठ पुरस्कार (2016) इस पुरस्कार के अंतर्गत पुरस्कार स्वरूप 11 लाख रुपए की धनराशि, प्रशस्ति पत्र और वाग्देवी की कांस्य प्रतिमा प्रदान की जाती है।

January 11th, 2017

 
 

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