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सृजन की जमीन पर उम्मीदों का नववर्ष

हिमाचल में सृजन की उर्वरा जमीन पर उम्मीदों की नई कोंपलें फूटंेगी ऐसी संभावना है। साहित्य समाज का दर्पण होने के साथ-साथ अपने समय का प्रामाणिक दस्तावेज भी होता है। जो अपने समय, समाज, संस्कृति और इतिहास को भी रेखांकित करता है। हिमाचली रचनाकारों में भी आज अपने समय की विदू्रपताओं और विषमताओं को लेकर एक छटपटाहट, बेचैनी और तड़प सी है। जो उनके रचनाकर्म में परिलक्षित होती  रहती है।

नववर्ष 2017 कई उम्मीदों, ढेर सारे सपनों, उमंगंों, आकांक्षाओं और लक्ष्यों को लेकर  आया है। नए साल में हिमाचली साहित्यकारों और  हिमाचली रचनाधर्मिता से भी ढेर सारी संभावनाएं और उम्मीदें  बंधती हैं। क्योंकि  हिमाचल में रचनात्मकता की दृष्टि से बीता साल उत्साहवर्द्धक रहा है। हिमाचल के हर पीढ़ी के लेखकों ने बीते वर्ष कहानी, कविता, गद्य, गजल, व्यंग्य हर विधा में अपनी सक्रियता साल भर दिखाई है। प्रादेशिक स्तर पर ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर हिमाचली रचनाशीलता की धमक का सिलसिला बीते कुछ सालों से बरकरार है।  यह सिलसिला इस साल भी जारी रहेगा ।

ऐसे में नए साल में भी हिमाचल में सृजन की उर्वरा जमीन पर उम्मीदों की नई कोंपलें फूटंेगी ऐसी संभावना है। साहित्य समाज का दर्पण होने के साथ-साथ अपने समय का प्रामाणिक दस्तावेज भी होता है। जो अपने समय, समाज, संस्कृति और इतिहास को भी रेखांकित करता है। हिमाचली रचनाकारों में भी आज अपने समय की विदू्रपताओं और विषमताओं को लेकर एक छटपटाहट, बेचैनी और तड़प सी है। जो उनके रचनाकर्म में परिलक्षित होती रहती है। जिनमें जीवन के सुर, ताल और लय और विचारधाराओं का सहज संप्रेषण भी है। जो बार-बार कहानियों, कविताओं के माध्यम से हमारे सामने सवाल बनकर खड़ा होता है।

इन सवालों के कठघरे में समाज ही नहीं हमारी सामाजिक परंपराएं भी हैं, राजनीति और नौकरशाही भी है। जिनसे हर रचनाकार अपने- अपने तरीके से सवाल उठाता है। मगर इन सभी सवालों के बीच एक और अहम सवाल यह भी है कि क्या जिनसे हमें शिकायत है उन तक हम अपनी बात पहुंचा पा रहे हैं या नहीं? साहित्यिक खेमेबाजी और अपने-अपने गढ़ों  से बाहर निकलकर इस पर सामूहिक चिंतन की दरकार है। साहित्य से समाज को जोड़ना होगा और नई पीढ़ी में साहित्य के संस्कार हस्तांतरित करने होंगे। इसके लिए सरकारी एवं संस्थागत स्तर पर प्रयास करने होंगे।

साहित्य की सार्थकता भी इसी में है कि वह कुछ लोगों और अलमारियों में कैद न रहकर आम जनता के बीच जाए। रचना की दुनिया का कोई शॉर्टकट नहीं है…और यह उसे कहीं भी नहीं ले जाता है। बस भटकाव सा रहता है…। समय के सच को समझते हुए …लीक से हटकर अपनी बात कहने का जोखिम उठाना होगा। अपने समय के दबावों और मुश्किलों को एक रचनकार महसूस कर सकता है और उससे सृजनात्मक ऊर्जा ग्रहण कर अपनी रचनाधर्मिता को समृद्ध किया जा सकता है। बीते साल युवा और महिला रचनाकारों की सक्रियता साहित्य के लिए शुभ संकेत रही।

भाषा एवं संस्कृति विभाग की ओर से शिमला में आयोजित युवा कविता कार्यशाला और हिमाचल कला संस्कृति एवं भाषा अकादमी की ओर से महिला साहित्यकार सम्मेलन अच्छी पहल रही। इसे नए साल में भी जारी रखना होगा और नए-नए सर्जक तलाशने होंगे। बीते साल ही युवा रचनाकारों और महिला साहित्यकारों की कहानी, कविता और गद्य पर करीब एक दर्जन से अधिक पुस्तकें आई हैं। यह एक सकारात्मक संकेत है। इधर, हिमाचल कला संस्कृति भाषा अकादमी की ओर से हर वर्ष दिए जाने वाले साहित्य एवं कला पुरस्कारों पर जमी बर्फ पिछले वर्ष कुछ हद तक पिघली। हालांकि, दो हजार सात से लेकर दो हजार ग्यारह तक इन पुरस्कारों को क्लब कर दिया गया। जिससे कड़े मुकाबले में कई दावेदार पिछड़ गए ।

वहीं पर  2012 से 2015 के पुरस्कार अभी तक घोषित नहीं किए गए। जबकि 2016 के लिए प्रविष्टियां ले ली गई हंै। मगर प्रदेश के सबसे बड़ा शिखर साहित्य सम्मान और गुलेरी सम्मान जो भाषा एवं संस्कृति विभाग द्वारा प्रदान किया जाता है, पिछले कई सालों से नहीं दिया जा रहा है। साहित्य को लेकर भाषा एवं संस्कृति विभाग को अपनी सक्रियता बढ़ानी चाहिए । क्योंकि हिमाचल की सृजनशीलता को आगे बढ़ाने में भाषा एवं संस्कृति विभाग का अपना अहम किरदार रहा है।

जिला स्तर पर विभाग द्वारा कई आयोजन करवाकर साहित्यिक माहौल को पटरी पर लाना होगा। वहीं पर स्थानीय स्तर पर साहित्यक संगठनों को नए साल में सुस्ती छोड़कर अपने-अपने क्षेत्र में रचनात्मक माहौल कायम करना होगा। तभी सृजन की उर्वरा जमीन पर उम्मीदों की नई कोंपलें प्रस्फुटित होंगी।

मुरारी शर्मा, 133/7 मोती बाजार, मंडी

January 9th, 2017

 
 

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