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हिमाचली भाषा की संभावनाएं

हिमाचल प्रदेश भाषा विभाग की पहाड़ी दिवस पर आयोजित संगोष्ठियों में भी इस विषय पर बहस हुई। ‘दिव्य हिमाचल’ के प्रतिबिंब स्तंभ में इस विषय पर लेखकों के विचार पाठकों को पढ़ने-सोचने को मिले, जो इस भाषा के प्रति सामयिक चिंतन को रेखांकित करते हैं। वर्ष 2016 के मध्य हिमाचल-पहाड़ी भाषा को लेकर काफी गरमाहट रही। लेखकों ने इसकी वर्तमान स्थिति को लेकर अपने विचार दिए, जो अधिकांशतः इसके पक्ष-विपक्ष में एक समान रहे। कुछेक ने इसके भाषा वैज्ञानिक पक्ष पर भी चर्चा की तो कुछ भाषा परिवारों के आधार पर भी परखते दिखे, परंतु समाहार में अधिकांशतः इसके विकास पर संतुष्ट रहे, जो सुखद लगा-वास्तव में हिमाचली-पहाड़ी भाषा को लेकर जो मुद्दे उठाए गए, उनमें इसे संविधान की आठवीं सूची में सम्मिलित करने की वकालत के साथ हिमाचल की किस बोली में हिमाचली-पहाड़ी भाषा बनने का सामर्थ्य है बहस का मुद्दा रहा।

हिमाचल प्रदेश भाषा विभाग की पहाड़ी दिवस पर आयोजित संगोष्ठियों में भी इस विषय पर बहस हुई। ‘दिव्य हिमाचल’ के प्रतिबिंब स्तंभ में इस विषय पर लेखकों के विचार पाठकों को पढ़ने-सोचने को मिले, जो इस भाषा के प्रति सामयिक चिंतन को रेखांकित करते हैं। बहस में निर्णायक बिंदु रहा। भाषा तो बोलियों से ही बनती है व बनी है। जिस बोली में बोलने-समझने वालों की संख्या अधिक होती है, जो व्यवहार सुगम होती है, वहीं भाषा का स्वरूप धारण करती है और कालांतर समीपवर्ती बोलियों की शब्द संपदा को स्वयं में समाहित करती समृद्धतर होती जाती है। संसार की सभी भाषाओं के उद्भव व विकास की यही प्रक्रिया रही है, परंतु इसके  लिए प्रदेशवासियों और खासकर बुद्धिजीवियां की मानसिकता का पक्ष में होना जरूरी है।

 हिमाचली भाषा की समस्या हिंदी के सम्मुख वैसी ही है,  जैसी हिंदी के व्यवहार हेतु अंग्रेजी भाषा, स्पष्टता हिमाचली-पहाड़ी हिमाचल की भाषा है, पहाड़ की भाषा है, हिमाचल की माटी, पानी, हवा, लोक धर्म व लोक व्यवहार की भाषा है। अतः इसे संवैधानिक पहचान-महत्त्व व स्थान मिलना चाहिए, जिसके लिए साहित्यिक संस्थाएं लंबे समय से मांग कर रही हैं। इस मांग व अधिकार प्राप्ति के लिए विधानसभा व सांसदों का सहयोग व प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।  पूर्वकाल में भौगोलिक स्थितियों व यातायात तथा संचार साधनों और निरक्षरता के कारण प्रदेश का जनमानस परस्पर कटा-कटा रहा।

छोटे-छोटे गांवों, बस्तियों, समुदायों में बिरसों को बांटा रहा, परंतु वर्तमान में समस्त हिमाचल विकास के हर बिंदु पर विकसित है, एक  है। अतः बुद्धिजीवियों को भाषा वर्गीकरण के पुराने सिद्धांतों को न घसीटकर नए चिंतन व दृष्टिकोण से भाषा विज्ञान को देखने का प्रयास करना सामजियक जरूरत है। आकाशवाणी केंद्रों, दूरदर्शन, सीडीज, डीवीडीज, उत्सवों के लोकगायन, नृत्य-नाट्य मंचों तथा विद्यालयों, कालेजों, विश्वविद्यालयों के युवा उत्सवों में हिमाचली भाषा रूपों को एक मंच पर केंद्रित कर दिया है।

आज जनजातीय गांवों में कांगड़ी, चंबयाली, मंडयाली, बिलासपुरी आदि जनपदीय लोकगीतों व नृत्यों की गंूज व गायन सुना जाता है। इसमें विपुल साहित्य रचा तथा प्रकाशित हो रहा है। देश भाषा-संस्कृति अकादमी तथा भाषा-संस्कृति विभाग की कई पुरस्कार प्रोत्साहन योजना से इसके विकास-प्रचार में कार्यरत हैं। अतः मेरे विचार से हिमाचली-पहाड़ी भाषा का भविष्य उज्ज्वल है। हिंदी से इसे कोई विरोध नहीं बार्हकइस से हिंदी भाषा तथा साहित्य दोनों समृद्ध होंगे। वैसे भी जब हिमाचल प्रदेश है तो हिमाचली भाषा का होना भी जरूरी है।

डा. गौतम शर्मा व्यथित, रैत, कांगड़ा

January 9th, 2017

 
 

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