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क्या होती है नवधा भक्ति

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शास्त्रों
में भक्ति की महिमा को तो विविध प्रकारों से रेखांकित किया ही गया है, विविध विशेषताओं के आधार पर उसका वर्गीकरण भी किया गया है।  प्राचीन शास्त्रों में भक्ति के 9 प्रकार बताए गए हैं जिसे नवधा भक्ति कहते हैं-

श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनमर।

अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥

अर्थात श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन  अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य  और आत्मनिवेदन भक्ति के नौ प्रकार हैं। भक्ति के इन समस्त प्रकारों को नवधा भक्ति भी कहा जाता है। गोस्वामी तुलसीदास भी अपने प्रसिद्ध ग्रंथ रामचरितमानस में नवधा भक्ति का उल्लेख करते हैं। जब भगवान् श्रीराम माता शबरीजी के आश्रम में आते हैं तो शबरीजी उनका हृदय से स्वागत करती हैं।  उनके श्रीचरणों को पखारती हैं, उन्हें आसन पर बैठाती हैं और उन्हें रसभरे कंद-मूल-फल लाकर अर्पित करती हैं। प्रभु बार-बार उन फलों के स्वाद की सराहना करते हुए आनंदपूर्वक उनका आस्वादन करते हैं। इसके पश्चात् भगवान राम शबरीजी के समक्ष नवधा भक्ति का स्वरूप प्रकट करते हुए उनसे कहते हैं कि-

नवधा भगति कहउं तोहि पाहीं।

सावधान सुनु धरु मन माहीं।।

प्रथम भगति संतन्ह कर संगा।

दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।।

गुर पद पकंज सेवा

तीसरि भगति अमान।

चौथी भगति मम गुन गन

करइ कपट तजि गान।

मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा।

पंचम भजन सो बेद प्रकासा।।

छठ दम सील बिरति बहु करमा।

निरत निरंतर सज्जन धरमा।।

सातवं सम मोहि मय जग देखा।

मोसे संत अधिक करि लेखा।।

आठवं जथालाभ संतोषा।

सपनेहुं नहिं देखइ परदोषा।।

नवम सरल सब सन छलहीना।

मम भरोस हिय हरष न दीना।।

इस प्रसंग में संतसंग को भक्ति का प्रथम प्रकार, प्रभु कथा के प्रति प्रेम को दूसरी भक्ति, गुरुओं की सेवा को तीसरे प्रकार की भक्ति, प्रभु लीला के प्रति आकर्षण को चौथी भक्ति, भजन को छठवीं भक्ति, संपूर्ण संसार को ईश्वरमय देखना सातवीं भक्ति, संतोष को आठवीं भक्ति और स्वयं को ईश्वर को अर्पित कर देना नवीं भक्ति मानी गई है।

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