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खंडित होते महिमामंडित डेरे

पंजाब और हरियाणा में फैले डेरों पर संत रविदास के प्रभाव को स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता है। संत रविदास ने मध्यकाल में छुआछूत जैसी सामाजिक बीमारियों पर प्रहार किया था। इसी कारण जब उनके विचारों का आश्रय लेकर डेरे स्थापित होने लगे, तो स्वाभाविक रूप से हाशिए पर स्थित समाज उनकी तरफ झुकता चला गया…

Aasthaपंजाब-हरियाणा की वास्तविकताओं से परिचित लोग इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि डेरों का जन्म सामाजिक विद्रूपताओं तथा छुआछूत के बीच से हुआ है। पंजाब और हरियाणा में फैले डेरों पर संत रविदास के प्रभाव को स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता है। संत रविदास ने मध्यकाल में छुआछूत जैसी सामाजिक बीमारियों पर प्रहार किया था। इसी कारण जब उनके विचारों का आश्रय लेकर डेरे स्थापित होने लोगे, तो स्वाभाविक रूप से हाशिए पर स्थित समाज उनकी तरफ झुकता चला गया। डेरों की लोकप्रियता तेजी से इसलिए बढ़ी क्योंकि इनके कारण हाशिए पर स्थित समाज में सुरक्षा का भाव पैदा हुआ था और समाज की मुख्यधारा में शामिल होने का मौका भी मिला। यहां पर इस बात को ध्यान में रखा जाना चाहिए कि यह वही संत रविदास हैं, जिन्होंने ‘मन हो चंगा तो कठौती में गंगा’ जैसे कथनों के जरिए जातीय श्रेष्ठता व धार्मिक आडंबरों को सिरे से नकार दिया था। उनके द्वारा दिया गया यह  मंत्र-‘मन हो चंगा तो कठौती में गंगा’ अस्पृश्य समाज के लिए एक संबल बन गया। यह आज भी लोगों की जुबान पर है और धार्मिक आडंबरों के खिलाफ आज भी संत रविदास के ये शब्द मुहावरे के रूप में सर्वाधिक इस्तेमाल होते हैं। इस मुहावरे को लेकर एक रोचक कथा सुनने को मिलती है। रविदास जी के माता-पिता चर्मकार थे। उन्होंने अपनी आजीविका के लिए पैतृक कार्य को अपनाया, लेकिन उनके मन में भगवान की भक्ति पूर्व जन्म के पुण्य से ऐसी रची-बसी थी कि आजीविका को धन कमाने का साधन बनाने की बजाय संत सेवा का माध्यम बना लिया। संत और फकीर जो भी इनके द्वार पर आते, उन्हें बिना पैसे लिए अपने हाथों से बने जूते पहनाते। इनके इस स्वभाव के कारण घर का खर्च चलाना कठिन हो रहा था। इसलिए उनके पिता ने उन्हें घर से बाहर अलग रहने के लिए जमीन दे दी। जमीन के छोटे से टुकड़े में रविदास जी ने एक कुटिया बना ली। जूते बनाकर जो कमाई होती, उससे संतों की सेवा करते। इसके बाद जो कुछ बच जाता, उससे अपना गुजारा कर लेते थे। एक दिन एक ब्राह्मण उनके द्वार आए और कहा कि गंगा स्नान करने जा रहे हैं, एक जूता चाहिए। उन्होंने बिना पैसे लिए ब्राह्मण को एक जूता दे दिया । इसके बाद एक सुपारी ब्राह्मण को देकर कहा कि इसे मेरी ओर से गंगा मैया को दे देना। ब्राह्मण रविदास जी द्वारा दी गई सुपारी लेकर गंगा स्नान करने चल पड़ा। गंगा स्नान करने के बाद गंगा मैया की पूजा की और जब चलने लगा तो अनमने मन से रविदास जी द्वारा दी सुपारी गंगा में उछाल दी। तभी एक चमत्कार हुआ। गंगा मैया प्रकट हो गईं और रविदास जी द्वारा दी सुपारी अपने हाथ में ले ली। गंगा मैया ने सोने का एक कंगन ब्राह्मण को दिया और कहा कि इसे ले जाकर रविदास को दे देना। ब्राह्मण भाव विभोर होकर रविदास जी के पास आया और बोला कि आज तक गंगा मैया की पूजा मैंने की, लेकिन गंगा मैया के दर्शन कभी नसीब नहीं हुए। आपकी भक्ति का प्रताप ऐसा है कि गंगा मैया ने स्वयं प्रकट होकर आपकी दी हुई सुपारी को स्वीकार किया और आपको सोने का कंगन दिया है। आपकी कृपा से मुझे भी गंगा मैया के दर्शन हुए। इस बात की खबर पूरी काशी में फैल गई। रविदास जी के विरोधियों ने इसे पाखंड बताया और कहा कि अगर रविदास जी सच्चे भक्त हैं तो दूसरा कंगन लाकर दिखाएं। विरोधियों के कटु वचनों को सुनकर रविदास जी भक्ति में लीन होकर भजन गाने लगे। रविदास जी चमड़ा साफ  करने के लिए एक बर्तन में जल भरकर रखते थे। इस बर्तन में रखे जल से गंगा मैया प्रकट हुई और दूसरा कंगन रविदास जी को भेंट किया। रविदास जी के विरोधियों का सिर नीचा हुआ और संत रविदास जी की जय-जयकार होने लगी। इसी समय से यह दोहा प्रसिद्ध हो गया ः ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’।  संत रविदास के जीवन से जुड़े ऐसे अनेक प्रसंग हैं, जो हाशिए पर स्थित समाज को समानता का बोध कराते हैं। इसी कारण हाशिए पर स्थित समाज संत रविदास को बहुत श्रद्धाभाव से देखता है। डेरों की लोकप्रियता प्रमुख कारण यही रहा है कि उन्होंने स्वयं को संत रविदास के विचारों का समर्थक घोषित किया और इस तरह देखते ही देखते उनके करोड़ों अनुयायी बन गए। प्रश्न यह है कि संत रविदास के विचारों से प्रभावित होकर पंजाब और हरियाणा में जिन डेरों का विकास हुआ, वही आजकल आडंबर के अड्डे कैसे बन गए। राम रहीम प्रकरण के बाद इस प्रश्न की प्रासंगिकता और भी अधिक बढ़ गई है। प्रश्न यह भी उठता है कि डेरों के प्रति लोगों में इतनी श्रद्धा कैसे पैदा हुई कि लोग मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं। इस प्रश्न का उत्तर पंजाब-हरियाण की सामाजिक स्थितियों को समझे बगैर नहीं मिल सकता। औपनिवेशिक शासन काल में जाटों व सिखों को ‘मार्शल रेस’ घोषित कर उन्हें विशेष रियायतें दी गईं। धीरे-धीरे अधिकांश खेतिहर भूमि उनके कब्जे में चली गई और उनमें श्रेष्ठता का भाव पैदा हो गया। इस मनोवैज्ञानिक स्थिति के कारण हाशिए पर स्थित समाज में एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था की चाहत पैदा होने लगी, जो उनमें सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा के साथ मुख्य धारा में होने का भाव भी पैदा कर सके। डेरों ने इन दोनों आवश्यकताओं की पूर्ति की। सामुदायिक पहचान पर आधारित होने के कारण जहां डेरों के कारण हाशिए पर स्थित समाज को अपनी पहचान मिली, वहीं डेरों द्वारा सामाजिक कल्याण के विभिन्न कार्यक्रमों के संचालन के कारण उनमें आर्थिक सुरक्षा का भाव भी पैदा हुए। डेरों से जुड़ने वाले लोगों का एक प्रमुख हिस्सा ऐसे लोगों का रहा है, जिन्हें कभी न कभी इन डेरों के कल्याणकारी कार्यक्रमों से लाभ मिला है। अब यदि डेरे इस विशाल जनसमर्थन को संभाल नहीं पा रहे हैं तो इसका प्रमुख कारण यही है कि वह संत रविदास के समानता के संदेश को तो बार-बार उछालते हैं लेकिन उनकी तरह सादगी के साथ जीवन व्यतीत करने की बात भूलते जा रहे हैं।

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