Divya Himachal Logo Sep 25th, 2017

गंगा को अविरल बहने दें

डा. भरत झुनझुनवाला

लेखक, आर्थिक विश्लेषक एवं टिप्पणीकार हैं

डा. भरत झुनझुनवालाहाइड्रोपावर, सिंचाई एवं जलमार्ग से गंगा को पहुंचाए जा रहे नुकसान की पूर्ति कृत्रिम सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स से नहीं की जा सकती, जैसे घी की कमी को रिफाइंड तेल से पूरा नहीं किया जा सकता है। गंगा अविरल बहेगी तो उसमें मछली पनपेगी और पानी स्वतः शुद्ध हो जाएगा। गंगा के अविरल प्रवाह को पुनर्स्थापित करने की जरूरत है। गंगा के अविरल प्रवाह को स्थापित करने से ही हम गंगा को कुछ दे सकेंगे…

प्रधानमंत्री का पदभार संभालने के तीन माह बाद नरेंद्र मोदी ने कहा था, ‘अब हमें गंगा से कुछ भी लेना नहीं, बस देना ही है।’ अपने इस संकल्प की पूर्ति के लिए उन्होंने गंगा जीर्णोद्धार मंत्रालय की जिम्मेदारी अब उनके कर्मठ सहयोगी नितिन गडकरी को सौंपी है। देश को आशा है कि गडकरी उसी तत्परता से गंगा की सफाई करेंगे, जिस तत्परता से उन्होंने देश में सड़कों का जाल बिछाया है। अब तक गंगा सफाई का पूरा फोकस सीवेज ट्रीटमेंट संयंत्रों पर रहा है। 1985 के गंगा एक्शन प्लान के बाद से केंद्र सरकार द्वारा नगर पालिकाओं को इन संयंत्रों को लगाने के लिए लगातार आर्थिक मदद दी गई है, परंतु नगर पालिकाओं की इन संयंत्रों को चलाने में रुचि नहीं होती, इसलिए ये संयंत्र अकसर बंद रहते हैं। इस समस्या का समाधान है कि संयंत्रों को पूंजी सबसिडी देने के स्थान पर गंगा जीर्णोद्धार मंत्रालय इनके द्वारा साफ किए गए पानी को खरीदे और उसे किसानों को सिंचाई के लिए उपलब्ध कराए। जल संसाधन मंत्रालय का कार्यभार संभालने वाले नितिन गडकरी ने गंगा के जीर्णोद्धार के लिए प्रयास शुरू भी कर दिए हैं। कुछ सूत्रों की मानें, तो उन्होंने गंगा की सफाई के लिए रोड मैप तैयार भी कर लिया है, जिसमें गंगा को स्वच्छ बनाने की एक व्यावहारिक रणनीति तैयार की गई है। यह दीगर है कि गंगा को सर्वाधिक बड़े शहरों ने ही दूषित किया है। इन शहरों में कोलकाता, वाराणसी, कानपुर, इलाहाबाद, पटना, हावड़ा, हरिद्वार और भागलपुर शामिल हैं। एक अनुमान के मुताबिक यही 10 शहर गंगा में 70 फीसदी प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हैं। नितिन गडकरी ने अगले तीन महीने में उन 10 शहरों में गंगा नदी की सफाई का काम शुरू करने का अल्टीमेटम दिया है। अगर इसी गति व उत्साह के साथ अगर गडकरी अपने मकसद की ओर बढ़ते रहे, तो यकीनन गंगा के जीर्णाेद्धार का सपना साकार हो सकता है। गडकरी को इस दौरान इस बात का भी ख्याल रखना होगा किकेवल सीवेज को गंगा में डालना बंद करने से गंगा का सच्चा जीर्णोद्धार नहीं होगा। सच्चा जीर्णोद्धार तब होगा, जब उसके पानी में निहित आध्यात्मिक शक्ति सुरक्षित रहे। गंगा को मोक्षदायिनी कहा जाता है।

वह बद्रीनाथ से भगवान विष्णु एवं केदारनाथ से भगवान शिव के प्रसाद को लाती है। पूर्व की सरकारों ने इस बात को नहीं समझा था। उन्होंने गंगा पर टिहरी, कोटेश्वर, विष्णु प्रयाग, श्रीनगर एवं चीला जलविद्युत परियोजनाओं को बनाया था। इन परियोजनाओं की टरबाइन में पानी के मथे जाने से बद्रीनाथ एवं केदारनाथ से लाई जाने वाली पानी की आध्यात्मिक शक्ति नष्ट हो जाती है जैसे आचमन के पानी को मिक्सी में मथ कर छिड़का जाए। नदी के पानी को शुद्ध रखने में मछलियों का बड़ा योगदान होता है। ये कूड़े को खा कर पानी को साफ कर देती हैं। मछलियां गंगा में विहार करती हैं। पूर्व में हिलसा मछली गंगा सागर से इलाहबाद आकर अंडे देती थी। फरक्का बैराज ने उसका रास्ता बंद कर दिया है और अब वह फरक्का के नीचे ही पाई जाती है। पूर्व में माहसीर मछली हरिद्वार से ऊपर रुद्रप्रयाग तक अंडा देने जाती थी। ऋषिकेश में बनी चीला जलविद्युत परियोजना ने उसका रास्ता बंद कर दिया है। पूर्व में 100 किलो वजन प्राप्त करने वाली वह मछली अब मात्र दो-चार किलो की रह गई है। गंगा के गंगत्व की रक्षा के लिए जरूरी है कि मछलियों के रास्ते में बनाए गए अवरोधों को हटाया जाए। पूर्व की सरकारों द्वारा खंडित की गई गंगा की अविरलता को पुनः स्थापित करना जरूरी है। अविरलता स्थापित करने से सफाई में भी मदद मिलेगी। अविरल नदी में मछलियां पनपती हैं और पानी को साफ कर देती हैं। जलविद्युत परियोजनाओं ने मछलियों के रास्ते को बंद करके उन्हें नष्ट नहीं, फिर भी कमजोर तो कर ही दिया है। बिजली बनाने के दूसरे विकल्प उपलब्ध हैं, जैसे सोलर अथवा थर्मल पावर। गडकरी को हाइड्रोपावर के स्थान पर इन विकल्पों को बढ़ावा देना चाहिए। गंगा के जीर्णोद्धार में दूसरी समस्या सिंचाई के लिए निकाले जा रहे पानी की है। हरिद्वार तथा नरोरा में गंगा के लगभग पूरे पानी को सिंचाई के लिए निकाला जा रहा है। सिंचाई परियोजनाओं ने नदी में पानी ही नहीं छोड़ा है और तमाम क्षेत्रों में मछलियां समाप्त हो चुकी हैं। नदी का पानी सड़ने लगा है। बनारस, सुल्तानगंज और कोलकाता में आज काली नदी, सरयू और चंबल का पानी बहता है, न कि गंगा का। गंगा के मूल पानी को नीचे पहुंचाने की जरूरत है। गंगा की रही-सही आध्यात्मिक शक्ति भी आज मैदानों में नहीं पहुंच रही है।

सिंचाई के भी दूसरे विकल्प उपलब्ध हैं। अपने देश में अधिकतर वर्षा जुलाई-अगस्त-सितंबर के माह में होती है। वर्षा का अधिकतर पानी समुद्र में बह जाता है। सिंचाई के लिए वर्षा के जल का संग्रहण किया जा सकता है। गडकरी को चाहिए कि किसानों को सबसिडी दें कि वे अपने खेतो के चारों तरफ सुदृढ़ मेढ़ बनाएं, जिससे वर्षा का पानी खेत में रुका रहे और जमीन में रिस कर भूमिगत एक्वीफायरों को भरे। जाड़े और गर्मी में इस पानी से सिंचाई की जा सकती है। तब गंगा के पानी को निकालने की जरूरत कम रह जाएगी और गंगा का जीर्णोद्धार होगा। गडकरी को गंगा पर जहाज चलाने पर भी पुनर्विचार करना चाहिए। बड़े जहाज चलाने के लिए गंगा की डे्रजिंग की जा रही है। डे्रजिंग से नदी की बालू खंडल-मंडल हो जाती है। मछलियों के अंडे नष्ट हो जाते हैं। उनके भोजन की वनस्पतियां नष्ट हो जाती हैं। डे्रजिंग तत्काल बंद करनी चाहिए। जहाजों से मोबिल आयल रिसता है। उनके पेंदे में लगा पेंट अकसर जहरीला होता है और वह भी पानी में घुलता है। जहाजों से निकली जहरीली कार्बन डाइआक्साइड गैस पानी द्वारा ज्यादा सोखी जाती है, चूंकि वह पानी के नजदीक होती है। अतः गंगा पर जल मार्ग बनाने पर पुनर्विचार करना चाहिए। छोटे जहाजों से ढुलाई करनी चाहिए। इससे रोजगार भी बनेंगे। ढुलाई का विकल्प रेल भी उपलब्ध है। ढुलाई के लिए गंगा को नष्ट नहीं होने देना चाहिए। हाइड्रोपावर, सिंचाई एवं जलमार्ग से गंगा को पहुंचाए जा रहे नुकसान की पूर्ति कृत्रिम सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स से नहीं की जा सकती, जैसे घी की कमी को रिफाइंड तेल से पूरा नहीं किया जा सकता है। गंगा अविरल बहेगी तो उसमें मछली पनपेगी और पानी स्वतः शुद्ध हो जाएगा। गंगा के अविरल प्रवाह को पुनर्स्थापित करने की जरूरत है। गंगा के अविरल प्रवाह को स्थापित करने से ही हम गंगा को कुछ दे सकेंगे। पूर्व की सरकारों द्वारा गंगा के साथ किए गए अत्याचार का प्रायश्चित करने की जरूरत है।

ई-मेल : bharatjj@gmail.com

September 12th, 2017

 
 

पोल

क्या वीरभद्र सिंह के भ्रष्टाचार से जुड़े मामले हिमाचल विधानसभा चुनावों में बड़ा मुद्दा हैं?

View Results

Loading ... Loading ...
 
Lingual Support by India Fascinates