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तहजीब भी सिखाती है मातृभाषा

( पूजा, मटौर, कांगड़ा )

जिस देश को अपनी मातृभाषा और साहित्य का गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता। इस एक वाक्य से मातृभाषा के महत्त्व को सहज ही समझा जा सकता है। मातृभाषा किसी भी इनसान की अभिव्यक्ति की पहली और सहज भाषा मानी जाती है। जब बच्चा इस दुनिया में आता है, तो पहला अक्षर मां सीखता है। वह भी हिंदी भाषा का ही शब्द है। एक सामाजिक प्राणी के तौर पर मानव जीवन में भाषा का बहुत अधिक महत्त्व होता है। एक भाषा ही हमें तहजीब सिखाती है। हर देश की अपनी एक मातृभाषा होती है, जिसका सम्मान किए बगैर वह देश उन्नति के पथ पर आगे नहीं बढ़ सकता। इसी तरह भारत की मातृभाषा हिंदी है। इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही माना जाएगा कि आजकल हम हिंदी को तिरस्कृत करके तथाकथित मॉडर्न इंग्लिश के मोह में फंसते जा रहे हैं। बेशक भाषा के तौर पर अंग्रेजी का अपना महत्त्व है, लेकिन इसे यह स्थान अपनी मातृभाषा की उपेक्षा की कीमत पर नहीं दिया जा सकता। मां-बाप को भी अंग्रेजी के लालच में फंसकर बच्चों को अपनी मातृभाषा से दूर नहीं रखना चाहिए। अगर बच्चों को अपनी मातृभाषा का ज्ञान ही नहीं होगा, तो वे उसका सम्मान क्या कर पाएंगे। इसके साथ ही हिंदी भाषा पूरे देश को एक डोर में बांधने का कार्य करती है, जाति, प्रदेश व मजहब की दूरियों का पाटती है। इस लिहाज से हिंदी की सहायता से ही देश की एकता और अखंडता को कायम रखा जा सकता है। हिंदी के प्रति अपनी सोच को बदलने के लिए आज का दिन यानी हिंदी दिवस एक अच्छा अवसर प्रदान कर रहा है।

 

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