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पेट्रोल-डीजल तीन साल के उच्चतम स्तर पर

दो महीने में एक बार भी कम नहीं हुईं कीमतें, सरकार की एमर्जेंसी मीटिंग

NEWSनई दिल्ली— पिछले दो महीने में पेट्रोल की कीमत एक बार भी कम नहीं हुई है और यह लगातार बढ़ती हुई तीन साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है। कच्चे तेल में कमजोरी और रुपए में मजबूती के बाद जिस तरह से पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ रही हैं, इसे लेकर तेल मंत्रालय की एमर्जेंसी मीटिंग बुलाई। हालांकि मीटिंग के बाद ऑयल मिनिस्टर धमेंद्र प्रधान ने कहा कि दुनियाभर में पेट्रोल की कीमतें बढ़ी हैं, जिसका असर भारत में भी हुआ।  श्री प्रधान ने यह भी कहा कि सरकार पेट्रोल और डीजल को भी वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के दायरे में लाने पर विचार करेगी, जिससे इनके दाम में बहुत ज्यादा अंतर नहीं रह जाएगा। अभी इन्हें जीएसटी से बाहर रखा गया है और पहले की तरह राज्य सरकारें इस पर वैट लगाती हैं, जिससे राज्य-दर- राज्य इनकी कीमतों में भारी अंतर देखने को मिलता है। गौर हो कि सरकार ने इस साल 16 जून से देश भर में पेट्रोल-डीजल के दाम रोजाना तय करने शुरू किए थे। इसके पीछे उसका तर्क था कि ग्राहकों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम में आई कमी का लाभ तत्काल मिल सकेगा। साथ ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में वृद्धि होने से तेल विपणन कंपनियां तत्काल दाम बढ़ाकर बोझ ग्राहकों पर डाल देंगी और उन्हें नुकसान नहीं होगा। देश की सबसे बड़ी तेल विपणन कंपनी ऑयल इंडिया की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के अनुसार इस साल 13 जुलाई के बाद से 61 दिन में पेट्रोल की कीमत एक बार भी कम नहीं की गई। पेट्रोल की कीमत दिल्ली के लिए 13 जुलाई को 63.91 रुपए तय की गई थी, जो बढ़कर 70.38 रुपए प्रति लीटर पर पहुंच गई है। इसका मतलब साफ है कि ग्राहकों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में आए उतार-चढ़ाव का लाभ नहीं मिल सका है। राष्ट्रीय राजधानी में पेट्रोल की यह कीमत 15 अगस्त, 2014 (72.51 रुपए प्रति लीटर) के बाद का उच्चतम स्तर है। अंतर यह है कि उस समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 100 डालर प्रति लीटर से ऊपर थी, जो इस समय 55 डालर के आसपास है। डीजल की कीमत 29 अगस्त के बाद से कम नहीं की गई है। राष्ट्रीय राजधानी में इंडियन ऑयल के पेट्रोल पंपों पर इसकी कीमत 13 सितंबर को 58.72 रुपए प्रति लीटर है, जो 31 अगस्त, 2014 (58.97 रुपए प्रति लीटर) के बाद का उच्चतम स्तर है। गौर हो कि तेल कंपनियां एक लीटर कच्चे तेल के लिए 21.50 रुपए का भुगतान करती हैं। इसके बाद एंट्री टैक्स, रिफाइनरी प्रोसेसिंग, लैंडिंग कॉस्ट और अन्य ऑपरेशनल कॉस्ट को मिला दें तो एक लीटर कच्चे तेल को रिफाइन करने में 9.34 रुपए खर्च होते हैं। मतलब एक लीटर पेट्रोल ऑयल कंपनियों को करीब 31 रुपए में पड़ता है। इसके बाद उस पर केंद्र सरकार की तरफ से टैक्स वसूला जाता है। इसका मतलब है कि आप 40 रुपए से ज्यादा तो सिर्फ टैक्स दे रहे हैं।

कच्चे तेल के दाम घटने का कोई फायदा नहीं

26 मई, 2014 को जब मोदी सरकार बनी थी, तब कच्चे तेल की कीमत 6330.65 रुपए प्रति बैरल थी, जबकि प्रति डालर रुपए की कीमत 58.59 थी, लेकिन 11 सितंबर, 2017 को कच्चे तेल की कीमत आधी घटकर 3368.39 रुपए प्रति बैरल पर आ गई, जबकि प्रति डालर रुपए की कीमत 63.89 रही। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब कच्चे तेल के दाम करीब आधे हो गए तो पेट्रोल-डीजल के दाम घट क्यों नहीं रहे?

लोगों की जेब काटकर कौन कर रहा कमाई

केंद्र में भाजपा सरकार के आने के बाद से डीजल पर लागू एक्साइज ड्यूटी में 380 प्रतिशत और पेट्रोल पर 120 फीसदी का इजाफा हो चुका है। इस दौरान केंद्र सरकार को इस मद से हुई कमाई भी तीन गुना से ज्यादा बढ़ गई है। इस दौरान वैट एवं सेल्स टैक्स से राज्यों की कमाई 129045 करोड़ रुपए से बढ़कर 166378 करोड़ रुपए हो गई। मतलब साफ है कि जनता की जेबें खाली कर सरकारें अपना खजाना भर रही हैं।

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