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विचलित करता है भाजपा का प्रसार

कुलदीप नैयर

लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं

कुलदीप नैयरभारतीय जनता पार्टी का प्रसार चिंता का विषय है क्योंकि यह मुसलमानों की आकांक्षाओं की उपेक्षा करती है। मोदी सरकार का सबके विकास का नारा भी भोथरा साबित होता जा रहा है। आरएसएस व भाजपा प्रमुख अमित शाह के कारण मोदी की यह प्रतिज्ञा भी पूरी होती नजर नहीं आती कि वह एक पूर्वाग्रह से मुक्त तथा पक्षपात-विहीन राष्ट्र का निर्माण करेंगे। अगर संघ के संबंध में आए कुछ उदारवादी भाजपाइयों के सुझावों को सख्ती से लागू किया गया होता, तो आज स्थिति कुछ और होती…

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत अपने अनुयायियों के साथ कोलकाता में एक जनसभा करने जा रहे थे, लेकिन इसके लिए बुक कराए गए हाल की बुकिंग रद्द करके मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। आरएसएस ने इसे रद्द करने की कार्रवाई को अलोकतांत्रिक करार दिया है। यह आलोचना बिलकुल ठीक है, लेकिन हिंदू-मुसलमान समीकरण को दूषित करने का संघ का रिकार्ड देखते हुए लगता है कि एहतियात बरतना जरूरी था। यह सच है कि ममता तानाशाह लगती हैं, लेकिन उनकी कार्रवाई को तर्कसंगत माना जाना चाहिए। इसके बावजूद मैं मानता हूं कि ममता ने अपनी आलोचना का एक मौका दे दिया है। उनके अन्य कदम, जैसे कि मुसलमानों को अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल करना तथा चयनित मुल्लाओं व मौलवियों को भत्ता देना उस लोकतांत्रिक भारत से मेल नहीं खाता, जिसे बनाने की हम कोशिश कर रहे हैं। एक विशिष्ट समुदाय की भावनाओं को तुष्ट करना स्पष्ट रूप से उनके वोट हासिल करने के लिए है। यह उससे भी बुरा है जो आरएसएस करता है। जहां कभी बाबरी मस्जिद थी, वहां रातोंरात मंदिर बनने का अध्याय फिलहाल बंद हो गया है। लेकिन यह मुसलमानों को संतुष्ट करता दिखाई नहीं दे रहा है, न ही यह उनके हित में है जैसा कि वह मानते हैं। संघ द्वारा संचालित भाजपा उसी तरह का वातावरण तैयार करने की कोशिश कर रही है। बहुलतावाद पर सरकार का गोलमोल रुख केवल हिंदुत्ववादी तत्त्वों की मदद कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विकृत वातावरण को स्वच्छ करने के लिए कुछ सकारात्मक कर लिया होता, लेकिन उनकी पार्टी ऐसा करती प्रतीत नहीं होती क्योंकि समाज को धु्रवीकृत रखने में उसे फायदा मिलता दिख रहा है।

कोई भी बाहरी व्यक्ति हस्तक्षेप नहीं कर सका क्योंकि उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले, जिसमें यथास्थिति बनाए रखने को कहा गया था, का अनुकरण करने के लिए कुछ ही काम किया। पंथनिरपेक्ष समाज का हिंदूकरण होने से देश की अखंडता को खतरा है। धर्म किसी राष्ट्र को कभी अखंड नहीं रख सकता, जैसा कि पाकिस्तान से अलग हुए बांग्लादेश का उदाहरण हमारे सामने है। उर्दू लागू करने से इस्लामिक पूर्वी पाकिस्तान अलग हो जाने के लिए विवश हो गया और वह संप्रभु गणतांत्रिक बांग्लादेश बन गया। भारत एक देश के रूप में इसलिए बना हुआ है क्योंकि विविध सांस्कृतिक वर्गों को छेड़ा नहीं गया है। यह सच है कि हिंदू कुल जनसंख्या का 80 फीसदी हैं। लेकिन एक उन्मादी गौण गतिविधि के अलावा अल्पसंख्यक मुसलमानों को कोई खतरा नहीं है। यदि संघ वास्तव में ही हिंदुत्व में रुचि रखता है तो उसे दलितों के लिए संघर्ष करना चाहिए क्योंकि पक्षपात के बावजूद यह तबका हिंदुत्व से जुड़ा रहा है। यह सच है कि कुछ दलितों ने अन्य धर्मों में अपनाने की स्वतंत्रता का इस्तेमाल किया है, लेकिन इस अभियान ने मुस्लिम व ईसाई समाजों को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है। अन्य धर्मों को अपनाने वाले दलितों को कमोबेश वही पक्षपात दूसरे धार्मिक समाजों में झेलना पड़ता है। हिंदू हितों के लिए संघर्ष का दावा करने वाले संघ प्रमुख ने हाल की उस घटना की निंदा नहीं की जिसमें एक दलित को इसलिए जलाकर मार डाला गया क्योंकि उसकी बकरी उच्च जाति के एक आदमी के खेत में भटक कर चली गई थी। अब जबकि मोदी ने देश की नब्ज को समझ लिया है, उन्हें दलितों की मदद करनी चाहिए तथा उच्च जातियों को कहना चाहिए कि वे दलितों से पक्षपात करना छोड़ दें। मोदी सरकार दावा करती है कि वह एक ऐसे भारत का निर्माण करना चाहती है जहां किसी से कोई पक्षपात नहीं होगा, इसके बावजूद मैंने कभी मोदी अथवा उनके कट्टर अनुयायियों को इस तरह की दलित विरोधी कार्रवाइयों की निंदा करते नहीं सुना।

दलितों को जलाने की घटनाओं को व्यापक रूप से देखे जाने वाले दूरदर्शन नेटवर्क पर कवरेज मिलनी चाहिए, भले ही यह रोज की घटनाएं न ही हों। लेकिन लगता है कि सरकार स्वयं यह नहीं चाहती कि इस तरह के मसले उठाए जाएं क्योंकि इसमें उच्च जातियों का प्रभुत्व है। ऐसा लगता है कि एक अलिखित कानून है जो निर्देश देता रहता है कि इस तरह के किस्से नहीं छापे जाने चाहिएं। जाहिर है कि इसे प्रेस की आजादी नहीं कहा जा सकता। परिणामस्वरूप देश के संस्थान अवनति की ओर हैं। देश का प्रमुख संस्थान मीडिया भी दबावों से मुक्त नहीं है। संघ संविधान के मूल ढांचे, पंथनिरपेक्षता को पलीता लगाने से ही नहीं हिचकिचाता है। संघ प्रमुख को समझना चाहिए कि हिंदुत्व का मूल सिद्धांत सह अस्तित्व तथा सहनशीलता है, न कि समाज का विभाजन। भारतीय जनता पार्टी का प्रसार चिंता का विषय है क्योंकि यह मुसलमानों की आकांक्षाओं की उपेक्षा करती है। मोदी सरकार का सबके विकास का नारा भी भोथरा साबित होता जा रहा है। आरएसएस व भाजपा प्रमुख अमित शाह के कारण मोदी की यह प्रतिज्ञा भी पूरी होती नजर नहीं आती कि वह एक पूर्वाग्रह से मुक्त तथा पक्षपात-विहीन राष्ट्र का निर्माण करेंगे। अगर संघ के संबंध में आए कुछ उदारवादी भाजपाइयों के सुझावों को सख्ती से लागू किया गया होता, तो आज स्थिति कुछ और होती। इसकी सबसे अधिक संभावना तब बनी थी जब गांधीवादी जयप्रकाश नारायण जनसंघ नेताओं को यह समझाने में सफल हो गए थे कि संगठन को भंग कर देना चाहिए और जनता पार्टी में शामिल हो जाना चाहिए। हालांकि पुराने जनसंघ नेता आरएसएस के निरंतर संपर्क में रहे और इससे एक बड़ा लक्ष्य पूरा नहीं हो पाया। बहुत पहले की बात नहीं है।

उदारवादी अटल बिहारी वाजपेयी ने आरएसएस व जनसंघ के बीच संबंधों को विराम देने के लिए भरपूर प्रयास किए। हालांकि वह केवल कागजों में ही सफल हुए। वह पुराने सदस्यों की वफादारी को बदल नहीं पाए। लालकृष्ण आडवाणी भी उन लोगों में शामिल हैं जिन्होंने भाजपा की स्थापना की थी। उन्होंने सोचा कि पुराने जनसंघ सदस्य जनता पार्टी में भरोसे लायक नहीं थे। वह पार्टी बनाने में इसलिए कामयाब हो गए क्योंकि गांधीवादी जयप्रकाश नारायण ने जनसंघ सदस्यों को जनता पार्टी में लाते हुए उन्हें विश्वसनीय बनाया। स्पष्ट रूप से वह अपने मिशन में कामयाब नहीं रहे। लेकिन स्थिति आज उससे भी खराब है। कांग्रेस अब प्रासंगिक नहीं है और देश में अन्य कोई विपक्ष नहीं है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भाजपा को रोक सकते थे, अगर उससे लड़ने के लिए वह गैर भाजपा दलों को एक मंच पर लाते। लेकिन उनके एनडीए में जाने से वे आशाएं भी मिट्टी में मिल गईं। इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही माना जाएगा। विनम्र हिंदुत्व, जो कि देश में प्रसारित हो रहा है, वह कमजोर हो जाएगा तथा पंथनिरपेक्ष व लोकतांत्रिक भारत का विचार पृष्ठभूमि में चला जाएगा। यह एक खौफनाक संभावना है।

ई-मेलः kuldipnayar09@gmail.com

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