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श्री विश्वकर्मा पुराण

कश्यप महर्षि भी अपने पुत्र एवं पुत्रवधु को लेकर अपने आश्रम की ओर चले गए। इस प्रकार रत्नादेवी तथा उसकी छोटी बहन का विवाह पूर्ण करके सारे जगत की तृप्ति देने वाले प्रभु स्वयं भोजन करने बैठे। वास्तु तथा इलाचल जिनकी चमर ढुला रहे हैं तथा पांचों पुत्र जिनके सामने ध्यानस्थ बैठे हैं ऐसे प्रभु को इला प्रेमपूर्वक सब सामग्री परोस रही थी…

सभी प्रभु विश्वकर्मा की जय-जयकार करने लगे। विश्वकर्मा के चार पुत्र सभी आमंत्रित की सेवा में रहे और पांचवां पुत्र विश्वकर्मा तथा बहन रत्नादेवी तथा पुरोहित की सेवा में खड़ा रहा था। लगन की विधि इस तरह आनंद से चल रही थी। इस दरम्यान अंधक को साथ लेकर वास्तुदेव ने रसोई की तैयारी कर दी। मंडप के बाहर सबके बैठने के लिए आसन एवं जलपात्र भी रख दिए गए। प्रभु की आज्ञा मिलते ही सब लोग भोजन के लिए तैयार होकर अपने-अपने आसन पर बैठ गए। यह सब व्यवस्था वास्तुदेव ने की थी। प्रभु की प्रेरणा से सुगंधी युक्त निर्मल वायु अपने पचास बंधुओं के साथ सबकी चमर ढोलने लगे। सरस्वती सहित नौ सौ निन्यानवे नदी सबको उत्तम जल देने लगीं, सात समुद्र सबको हाथ-पैर धोने को जल देने लगे और वास्तु के द्वारा नियुक्त किए इलाचल बगैरह साठ हजार पर्वत सबको अनेक प्रकार की सामग्री परोसने लगे। दस हजार पर्वतों का नेता बनकर हिमाचल सभी उत्तम प्रकार की मेवा, मिठाई परोसने लगा। विद्याचल दस हजार पर्वतों को साथ लेकर अनेक प्रकार की कंद, मूल फल तथा तरह-तरह की भाजी के साग परोसने लगे। उस समय जिसकी भी जो-जो इच्छा थी वह पूर्ण करके सब देवता भी अपनी इच्छा पूर्ण हुई देखकर वर-कन्या को आशीर्वाद देकर अपने स्थान को गए। कश्यप महर्षि भी अपने पुत्र एवं पुत्रवधु को लेकर अपने आश्रम की ओर चले गए। इस प्रकार रत्नादेवी तथा उसकी छोटी बहन का विवाह पूर्ण करके सारे जगत की तृप्ति देने वाले प्रभु स्वयं भोजन करने बैठे। वास्तु तथा इलाचल जिनकी चमर ढुला रहे हैं तथा पांचों पुत्र जिनके सामने ध्यानस्थ बैठे हैं ऐसे प्रभु को इला प्रेमपूर्वक सब सामग्री परोस रही थी। भोजन करने बैठे प्रभु ने जैसे ही एक कौर हाथ में लिया कि तुरंत ही उसका हाथ अटक गया, हाथ में लिया अन्न का ग्रास वापस थाल में रखकर प्रभु उठ गए, यह देखकर ही सबका हृदय एकाएक कांप उठा सब समझ गए कि कोई अनर्थ हुआ है। इससे सबके मन में अनेक प्रकार के तर्क-वितर्क होने लगे। सब विचार में पड़ गए कि अपने हाथ से तो कोई गलती न हुई हो भोजन के थाल से उठकर प्रभु तुरंत ही समाधि में बैठ गए तथा वास्तु सहित पांचों पुत्र और इला एवं इलाचल प्रभु के सामने दोनों हाथ जोड़कर खड़े और सोचने लगे आज जरूर कोई अनर्थ हुआ है। उनके किसी भक्त पर संकट आया है या फिर प्रभु ने किसी का दुष्ट कृत्य देखा है, किसी की अति पवित्र आत्मा को दुख मिला है या फिर देवताओं के ऊपर कोई संकट आया है। रत्नादेवी और सूर्यनारायण तथा कश्यप महर्षि की छोटी पुत्री के साथ जाते प्रियव्रत के ऊपर तो आफत नहीं आई। इस तरह अनेक प्रकार के तर्क-वितर्क करके ये आठों जने प्रभु के सामने हाथ जोड़कर खडे़ रहे। प्रभु का रोष उनके ऊपर न उतरे, इसलिए मन ही मन प्रभु की प्रार्थना करने लगे।

 

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