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सर्वश्रेष्ठ तीर्थ पिहोवा

तीर्थ पिहोवापिहोवा को पवित्र माना जाता है और कुरुक्षेत्र से भी अधिक पवित्र सरस्वती नदी है। सरस्वती नदी के भी अनेक तीर्थ हैं, इन सब में पिहोवा तीर्थ सर्वश्रेष्ठ है। सरस्वती के बारे में वामन पुराण में पढ़ने को मिलता है। गंगा, यमुना, नर्मदा, सिंधु इन चारों नदियों के स्नान का फल अकेले पिहोवा में ही प्राप्त हो जाता है। सरस्वती का जल पीने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। मंत्र शास्त्र के अनुसार सरस्वती का जल पीने का इतना महत्त्व है कि बारह मास तक नियम से जो श्रद्धालु सरस्वती का जल पीता है उसे वैसे ही शक्ति की प्राप्ति होती है, जैसे देवगुरु बृहस्पति को हुई थी। वामन पुराण में चेतावनी दी गई है कि जिन लोगों ने पिहोवा तीर्थ का नाम नहीं सुना, अपनी आंखों से नहीं देखा, मन से पिहोवा को याद नहीं किया, ऐसे लोगों के पितर पितृलोक में बैठे हुए कहते हैं कि हमारे पुत्र-पौत्रादिकों ने व्यर्थ में जन्म लिया है।  ऐसी संतानों को धिक्कार है। इसी पिहोवा में गाधि राजा के पुत्र विश्वामित्र ने क्षत्रिय से ब्राह्मण का दर्जा प्राप्त किया। यही वह तीर्थ है, जिसमें मुनिश्रेष्ठ रुषंग ऋषि अपने पुत्रों के साथ गंगा तट हरिद्वार को छोड़कर मोक्ष प्राप्ति के लिए आए थे।  इसी तीर्थ में राजा ययाति ने 100 यज्ञ किए थे। यहीं पर देव सेनापति स्वामी कार्तिकेय अपने असंख्य गणों के साथ रात-दिन निवास करते हैं। यहां पर कार्तिकेय का प्राचीन मंदिर है। रुषंग ऋषि ने अपने पुत्रों को पिहोवा का महत्त्व इस प्रकार बताया है, हे पुत्र्ा! जो मनुष्य सरस्वती के तट पर स्थित पिहोवा पर जप करते हुए शरीर छोड़ता है, वह जन्म-मरण से रहित होकर मोक्ष को प्राप्त करता है। गंगा के जल में अस्थि प्रवाह से मुक्ति होती है, काशी में देह त्याग से मुक्ति होती है, किंतु पिहोवा तीर्थ में जल, स्थल व अंतरिक्ष आदि पर मृत्यु होने पर भी मोक्ष मिलता है यानी कि पिहोवा गंगा द्वार से भी अधिक पवित्र व महत्त्वपूर्ण है। महाभारत, मार्कंडेय पुराण, पद्म पुराण, भागवत पुराण तथा वामन पुराण आदि में जिसे कुरुक्षेत्र भूखंड का हिस्सा माना गया है, इसे सभी प्रकार के दोषों से रहित कहा गया है। पिहोवा को धर्मक्षेत्र की संज्ञा मिली है। वामन पुराण के अनुसार इस तीर्थ की रचना प्रजापिता ने पृथ्वी, जल और वायु के साथ सृष्टि के आरंभ में की थी। जबकि महाभारत में लिखा है कि पिहोवा की आठ कोस भूमि पर बैठ कर ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी। गंगा पुत्र भीष्म पितामह की सद्गति भी पृथुदक में हुई थी। पिहोवा में प्रेत पीड़ा शांत होती है। अकाल मृत्यु होने पर दोष निवारण के लिए पिहोवा में कर्मकांड करवाने की परंपरा है। ऐसा करने से मृतक प्राणी अपगति से सद्गति को प्राप्त हो जाता है। वामन पुराण के अनुसार अति पुरातन काल में भगवान शंकर ने पिहोवा में पधारकर स्नान किया था। यहां पर पिंडदान का बड़ा महत्त्व माना गया है। और तो और भगवान इंद्र ने भी अपने पितरों का पिंडदान इसी तीर्थ पर किया था। इस तीर्थ का नाम राजा पृथु के नाम पर पड़ा। यहीं सरस्वती के तट पर पृथु ने पिता की मृत्यु के बाद उनका अंतिम संस्कार व पिंडदान तथा समस्त प्राणियों को जल प्रदान करके संतुष्ट किया। इसी कारण इस तीर्थ का नाम पृथुदक अथवा पिहोवा पड़ा। महाभारत के अनुसार यहां स्नान व पिंडदान करने से श्रद्धालु व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ का फल तो मिलता ही है, स्वर्ग लोक भी मिल जाता है। पिहोवा के पवित्र सरस्वती सरोवर के तट पर पितरों का पिंडदान किया जाता है। यहीं पर पंडे, पुरोहित पिंडदान के लिए तैयार मिलते हैं। अलग-अलग घाट के लिए अलग-अलग पंडे हैं। पिंडदान और श्राद्ध कर्म करवाने से लिए ये पूरे साल उपलब्ध रहते हैं। पिहोवा का मुख्य तीर्थ सरस्वती सरोवर है। इसी के जल में लोग नहाते हैं और अस्थि प्रवाह करते हैं। उत्तरी भारत के लोग अपने पितरों की सद्गति के लिए वर्षभर यहां आते रहते हैं, लेकिन श्राद्ध के दिनों में यहां पिंडदान करना अधिक फलदायी माना गया है।

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