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स्कूल से लेकर यूनिवर्सिटी तक हिंदी का डंका

प्रदेश में हिंदी विषय एक महत्वपूर्ण विषय के रूप में छात्रों को पढ़ाया जा रहा है। इस विषय के महत्त्व का अनुमान इस बात से ही लगाया जा सकता है कि प्रदेश में प्राथमिक शिक्षा से लेकर विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा में हिंदी को शामिल किया गया है। प्रदेश शिक्षा विभाग की ओर से कक्षा पहली से लेकर कालेज तक हर स्तर पर हिंदी विषय को छात्रों के सिलेबस में शामिल किया गया है। छात्र जब स्कूल में प्रवेश लेता है तो वहीं से हिंदी विषय की शिक्षा शुरू कर दी जाती है और यह क्रम लगातार उच्च शिक्षा तक जारी रहता है। स्कूली स्तर की शिक्षा में हिंदी विषय की पढ़ाई अनिवार्य विषय के रूप में दसवीं कक्षा तक ही सीमित है। इसके बाद जमा एक और दो में हिंदी विषय मात्र छात्र की रुचि का आधार बन कर रह गया है। जमा एक और जमा दो की कक्षाओं में हिंदी विषय मात्र कला संकाय के छात्रों तक ही सीमित कर दिया गया है।

इस संकाय में शिक्षा ग्रहण कर रहे छात्रों को भी हिंदी के अलावा अन्य विषयों के विकल्प रखे गए हैं। अब यह छात्र पर निर्भर करता है कि वह हिंदी विषय को पढ़ना चाहता है या नहीं। बावजूद इसके, छात्र भाषा विषय में हिंदी विषय का चयन अंग्रेजी की अपेक्षा अधिक कर रहे हैं। बात की जाए अन्य संकायों में साइंस और कॉमर्स की तो इनसे जुड़े छात्रों के पास हिंदी विषय पढ़ने का कोई विकल्प नहीं है। स्कूली स्तर की शिक्षा के बाद कालेज स्तर पर हिंदी के ज्ञान से छात्रों को जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। उच्च शिक्षा में मातृ भाषा हिंदी को तरजीह देना यह दर्शाता है कि छात्रों की उच्चतर शिक्षा में भी हिंदी भाषा का योगदान और महत्व बना हुआ है। प्रदेश के कॉलेजों में वर्ष 2013 में सीबीसीएस यानी रूसा को लागू कर दिया गया है, लेकिन हिंदी विषय के लिए नियमों में परिवर्तन इस प्रणाली के तहत भी नहीं किया गया है। रूसा प्रणाली लागू होने से पहले भी तीन वर्षीय यूजी डिग्री में छात्रों को एक वर्ष में सभी संकाय के छात्रों को हिंदी विषय पढ़ना अनिवार्य था और अब रूसा के तहत भी पहले और दूसरे सेमेस्टर में साइंस, आर्ट्स और कॉमर्स संकाय के छात्रों को हिंदी विषय पढ़ना अनिवार्य है। इन सेमेस्टर के बाद केवल कला संकाय के छात्र, जिन्होंने अनिवार्य विषय के रूप में हिंदी विषय का चयन किया है, वही छात्र इसकी शिक्षा ग्रहण करते हैं। कालेज से हिंदी विषय से डिग्री हासिल करने वाले छात्रों के लिए हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में अलग से हिंदी विभाग चलाया जा रहा है। इस विभाग में छात्रों को मास्टर डिग्री के साथ-साथ शोध के अवसर भी हिंदी विषय में दिए जा रहे हैं। हर वर्ष सैकड़ों छात्र विवि के हिंदी विभाग से अपनी मातृ भाषा में मास्टर डिग्री हासिल कर रहे हैं।

शोध का स्तर भी इस विषय में अन्य विषयों या अंग्रेजी भाषा से कम नहीं है। प्रति वर्ष हिंदी विभाग से एमफिल में 5 के करीब और पीएचडी में 8 से 10 छात्र निकलते हैं। हालांकि बीते कुछ वर्षों तक विवि में हिंदी विभाग उपेक्षा का शिकार हुआ जिसकी वजह से पांच सालों तक इस विभाग की बागडोर एक ही नियमित अध्यापिका के हाथों में रही। इसके कारण विभाग में शोध के स्तर पर भी इसका असर पड़ा, लेकिन अब 5 नियमित शिक्षक विभाग में छात्रों को हिंदी विषय का ज्ञान दे रहे हैं और दो ही शिक्षकों के पद इस समय विभाग में रिक्त पडे़ हैं। भले ही प्रदेश में उच्च शिक्षा में हिंदी भाषा वैकल्पिक तौर पर ही शामिल की गई है, बावजूद इसके छात्र इस विषय का अध्ययन करने के साथ ही शोध कार्य करने को प्राथमिकता दे रहे हैं। मगर कहीं न कहीं हिंदी विषय को उच्च शिक्षा में अनिवार्य रूप से शामिल करने की आवश्यकता आज भी है। छात्रों को हिंदी का ज्ञान विकल्प के तौर पर देने के चलते कहीं न कहीं आज के दौर में मातृ भाषा अपनी वास्तविक पहचान खो रही है।

-भावना शर्मा

 

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