हिमरी गंगा

हिमरी गंगापद्धर उपमंडल के अंतर्गत आने वाली हिमरी गंगा में हर वर्ष भादों के महीने में बहुत बड़ा मेला लगता है। इस विशाल शीतल जलधारा के बारे में जनमत है कि देवादिदेव हुरंग नारायण बाल रूप में सनेड़ गांव की एक वृद्धा के यहां ग्वाले के रूप में काम किया करते थे। बालक अपने साथियों संग मवेशियों को घोघरधार में चराने के लिए ले जाता था। इस दौरान अन्य ग्वाल अपने मवेशियों को उहल नदी में ले जाकर पानी पिलाते थे जबकि बालक नारायण ऐसा न कर मरहबू के पेड़ के नीचे अपनी छड़ी चुभाता था, जहां स्वतः ही विशाल जलधारा फूट पड़ती थी। ऐसे में नारायण हर रोज ऐसा करके अपने मवेशियों की प्यास बुझाता था, लेकिन साथी ग्वालों को यह  मालूम नहीं था। उन्होंने एक दिन बुढि़या को शिकायत कर दी कि नारायण मवेशियों को बिना पानी पिलाए घर ले आता है। यही नहीं बुढि़या ने गुस्से में नारायण को घर से निकलने को कह दिया। अपनी बात प्रमाणित करने के लिए उसे बुढि़या को हिमरी गंगा स्थान पर लाना पड़ा। उस दिन भी नारायण ने बुढि़या के सामने जमीन पर छड़ी से वार किया, जहां विशाल जलधारा जमीन से फूट पड़ी। लेकिन बुढिया को एकाएक देखते ही बालक नारायण गायब हो गया। यहां उसी कालांतर से पहाड़ों के बीच से विशाल जलधारा बह रही है। लोकमत यह भी है कि उसके बाद चौहरघाटी के हुरंग गांव में एक किसान को हल चलाती बार खेत में बालक नारायण का मुखौटा मिला। किसान उसे किलटे में डालकर घर ले गया जहां बाद में वह देव हुरंग नारायण के नाम से विख्यात हुए। इस पवित्र विशाल जलधारा में स्नान करने के पीछे लोक आस्था है कि यहां स्नान करने से जहां निःसंतान दंपतियों को संतान प्राप्ति होती है , वहीं चर्म रोग आदि से भी निजात मिलती है। संतान प्राप्ति के इच्छुक दंपति यहां सरोवर में अखरोट और फल फेंकते हैं, बाद में महिलाएं अपना दुपट्टा सरोवर में फैलाती हैं। कहा जाता है कि फल और फूल दुपट्टे में आ जाएं तो संतान की प्राप्ति होती है। हिमरी गंगा से लगभग 2 किमी.नीचे एक गुप्त गंगा हैं, जहां से भी जलधारा गुजरती है। यहां भी श्रद्धालु  इस पावन दिवस पर डुबकी लगाते हैं। लोक आस्था है कि जिस तरह भैरों के दर्शन के बिना माता वैष्णो के दर्शन अधूरे माने जाते हैं, ठीक उसी प्रकार हिमरी गंगा का स्नान भी गुप्त गंगा में स्नान किए बगैर अधूरा माना जाता है।

 स्टाफ रिपोर्टर, पद्धर

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